Homeधर्मश्रीमद्भागवत कथा के तीसरे दिन समुंद्र मंथन का वर्णन

श्रीमद्भागवत कथा के तीसरे दिन समुंद्र मंथन का वर्णन

समुंद्र मंथन की कथा मन के मंथन की कथा है:आचार्य शिव प्रसाद मिश्रा

रिर्पोट: शिवांशु मिश्रा

शुकुल बाजार अमेठी।भटमऊ गांव में घनश्याम शुक्ला के यहां चल रही संगीतमय श्रीमद् भागवत कथा के तीसरे दिन भगवान वामन अवतार व समुद्र मंथन का प्रसंग सुनाया।कथा में कथावाचक ने कहा कि जब लक्ष्मीजी का विवाह होना तय हुआ तो उनके सामने सभी देवों को बिठाया गया और कहा गया कि इनमें से जो भी देवता आपको पसंद है, उनको आप वर माला पहनाएं। इस पर लक्ष्मीजी ने बारी-बारी सभी देवताओं की ओर देखा तथा अंत में जाकर भगवान विष्णु को लक्ष्मीजी ने माला पहनाई और उसके बाद समुद्र मंथन हुआ।कथा वाचक ने समुंद्र मंथन का वर्णन करते हुए बताया कि समुद्र मंथन से चौदह रत्‍‌न निकले-श्री, मणि, रम्भा, वारुणी, शंख, गजराज, कामधेनु, कल्पद्रुम, चन्द्रमा, धन्वन्तरि, धनुष, वाजि, विष, और अमृत। समुद्र मथा गया था जिसमें एक हाथी निकला, घोड़ा निकला, एक अप्सरा निकली, श्री (लक्ष्मी) निकलीं। “श्री मणि रम्भा वारुणी , अमिय शंख गजराज।कल्पद्रुम शशि धेनु धनु, धन्वन्तरि विष वाज।।” यह सब उदाहरण हैं, प्रतीकात्मक हैं। संसार एक समुद्र है। यह समुद्र अपनी जगह है, यह पृथ्वी अपनी जगह है। इसको उदाहरण के रूप में देकर पूर्व देवासुर संग्राम में समुद्र का मंथन हुआ बताया गया है।अचल मन ही मंदराचल है। मन अचल होकर कभी नहीं टिकेगा बल्कि संसाररूपी समुद्र में डूबता ही चला जायेगा। भगवान अपनी पीठ अर्थात सहारा दे दें तभी टिकेगा। जिस प्रकार खतरे का आहट पाते ही कछुआ अपने अंगों को समेट लेता है उसी प्रकार जब संयम सध जाता है, वृत्तियां, मनसहित इनिद्रयां अन्तर्मुखी हो जाती हैं। उस समय भगवान की मदद मिलती है। मन स्थायित्व ले लेता है। फिर नहीं डूबता, ऊपर ही टिका रहता है। श्वास प्रश्वास का यजन, जिसमें भगवान वासुकी नाग हैं, इसी से मंथन किया गया। अभ्यास सूक्ष्म होता गया, रत्‍‌न निकलते गये।कथा वाचक पंडित शिव प्रसाद मिश्रा ने कहा कि श्रीमद्भागवत कथा सुनने से मनुष्य के कई जन्मों के पापों का क्षय हो जाता है। हमें भागवत कथा सुनने के साथ साथ उसकी शिक्षाओं पर भी अमल करना चाहिए। वामन अवतार के रूप में भगवान विष्णु ने राजा बलि को यह शिक्षा दी कि दंभ तथा अहंकार से जीवन में कुछ भी हासिल नहीं होता है। यह धन संपदा क्षण भंगुर होती है। इसलिए इस जीवन में परोपकार करों।उन्होंने कहा कि अहंकार, गर्व, घृणा और ईर्ष्या से मुक्त होने पर ही मनुष्य को ईश्वर की कृपा प्राप्त होती है। ईर्ष्यालु व्यक्ति अपने जीवन में कभी तरक्की नहीं कर सकता। ऐसे व्यक्तियों को भगवान सूर्य, वायु, नदियों, बादलों व वृक्षों इत्यादि से प्रेरणा लेनी चाहिए।उन्होंने कहा कि यदि अपना उद्धार करना चाहते हो तो परोपकार में अपना जीवन लगाओ, जिससे तुम्हारा कल्याण होगा।इस अवसर पर मुख्य यजमान रमाकांत शुक्ला,द्वारिका नाथ शुक्ला,उमादत्त मिश्रा,पवन मिश्रा,शीताशरण शुक्ला उर्फ तुन्नी, रामू श्रीवास्तव,अर्पित तिवारी सहित अन्य भक्तगण उपस्थित रहे।

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