आकर्षक, उज्ज्वल और सम्मोहक हैं छाया शुक्ला की ग़ज़लें : वशिष्ठ अनूप।
‘इक परिदें सी उड़ने लगी ज़िन्दगी’ का हुआ लोकार्पण।
वाराणसी,लोकप्रिय ग़ज़लकार छाया शुक्ला के नवीन ग़ज़ल संग्रह ‘इक परिदें सी उड़ने लगी ज़िन्दगी’ का लोकार्पण शनिवार को राजकीय जिला पुस्तकालय सभागार में सम्पन्न हुआ। कार्यक्रम में साहित्यकारों एवं ग़ज़ल प्रेमियों की उल्लेखनीय उपस्थिति रही।
मुख्य अतिथि वरिष्ठ साहित्यकार वशिष्ठ अनूप ने संग्रह का लोकार्पण करते हुए कहा कि इस कृति की ग़ज़लों में हमारे समय और समाज की सशक्त पहचान दिखाई देती है। उन्होंने कहा कि संग्रह में जीवन-जगत की अनेक छवियाँ उभरती हैं, किन्तु जीवन के आकर्षक, उज्ज्वल और सम्मोहक रूप विशेष रूप से प्रभावशाली बनकर सामने आए हैं।
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे डॉ. दयानिधि मिश्र ने कहा कि छाया शुक्ला की ग़ज़लें स्तरीय हैं तथा किसी वाद से प्रभावित नहीं हैं। उनकी दृष्टि अपने समय के समूचे परिदृश्य पर केंद्रित है और उनकी ग़ज़लों का फलक अत्यंत विस्तृत है। उन्होंने कहा कि इस संग्रह में वर्तमान जीवन के अनेक ज्वलंत विषयों को अभिव्यक्ति देने वाले प्रभावशाली अशआर शामिल हैं।
प्रसिद्ध ग़ज़लकार शिवकुमार पराग ने कहा कि छाया शुक्ला की ग़ज़लें विविध रंगों और स्वरों से सजी हुई हैं, जिनका मूल स्वर प्रेम है। उन्होंने कहा कि उनकी भाषा हिंदी-उर्दू मिश्रित होने के बावजूद सहज भावबोध कराती है और उसमें अनुराग, आस्था एवं समर्पण का सुंदर समन्वय दिखाई देता है।
विशिष्ट अतिथि प्रो. श्रद्धानन्द ने कहा कि छाया शुक्ला की ग़ज़लों में जीवन-सौंदर्य की विविध छटाओं की सार्थक अभिव्यक्ति हुई है। उनकी रचनाएँ विसंगतियों के बीच आस्था, विश्वास, प्रेम और आध्यात्मिक चेतना को सशक्त ढंग से प्रस्तुत करती हैं। उन्होंने कहा कि इन ग़ज़लों में सादगी के साथ ताजगी का भी विशेष अहसास मिलता है।
कार्यक्रम के प्रारंभ में छाया शुक्ला ने अपनी रचना-प्रक्रिया पर प्रकाश डालते हुए चुनिंदा ग़ज़लों का पाठ किया। स्वागत कंचन सिंह परिहार ने किया, जबकि संचालन हिमांशु उपाध्याय एवं धन्यवाद ज्ञापन नरेन्द्र नाथ मिश्र ने किया।
द्वितीय सत्र में आयोजित काव्यगोष्ठी का संचालन प्रसन्न वदन चतुर्वेदी ने किया। इस अवसर पर सूर्यकान्त त्रिपाठी, कवीन्द्र नारायण, ब्रजेश पाण्डेय, एस.एन. उपाध्याय, नसीमा निशा, गिरिजेश तिवारी, मनोज वर्मा, डॉ. उषा पाण्डेय, राजेश राय, बुद्धदेव तिवारी, आनन्द कृष्ण मासूम, योगेश चतुर्वेदी एवं वासुदेव उबेरॉय सहित अनेक साहित्यकार उपस्थित रहे।
