आदर्शवादी-यथार्थवाद को दर्शाता है, प्रेमचंद की कहानी झाकी।
झांकी’ कहानी हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि क्या धर्म केवल रीति-रिवाजों और सजावट में है। कहानी का अंत प्रेमचंद के आदर्शवादी-यथार्थवाद को दर्शाता है, जहाँ वे पाठकों की अंतरात्मा को झकझोर कर छोड़ देते हैं। उक्त कथन प्रो श्रद्धानंद द्वारा प्रेमचंद की जन्मभूमि लमही गूंजी प्रेमचंद की कहानी झांकी का पाठन उमेश चन्द्र जैन ने
वाराणसी के लमही स्थित प्रेमचंद मार्गदर्शन केंद्र ट्रस्ट द्वारा आयोजित साप्ताहिक साहित्यिक कार्यक्रम “सुनो मैं प्रेमचंद” के 1910 वा दिवस संपन्न हुआ। कार्यक्रम में स्थानीय साहित्यप्रेमियों, विद्यार्थियों और शोधार्थियों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया।
कार्यक्रम की शुरुआत उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद की प्रतिमा पर माल्यार्पण कर किया गया।
संतोष कुमार प्रीत ने कहा कि प्रेमचंद की कहानी ‘झांकी’ उनके कथा-साहित्य के उस पड़ाव की रचना है जहाँ वे केवल मनोरंजन के लिए नहीं, बल्कि समाज के पाखंड और मानवीय मनोविज्ञान की गहरी परतों को उघाड़ने के लिए लिखते थे। यह कहानी धार्मिक दिखावे और सच्ची भक्ति के बीच के अंतर को बहुत ही मार्मिक ढंग से प्रस्तुत करती है। इस अवसर पर राजतन पाल सज्जन ने मात्रृ शक्ति को समर्पित काव्यपाठ प्रस्तुत किया। कार्यक्रम में मुख्य रूप से धीरेन्द्र कुमार श्रीवास्तव, राजेश कुमार श्रीवास्तव, विपनेश सिंह, संजय श्रीवास्तव, प्रांजल श्रीवास्तव, संगीत श्रीवास्तव, समीक्षा त्रिपाठी, आलोक शिवाजी, डाक्टर मनोहर लाल, मनोज श्रीवास्तव, राहुल यादव, समीक्षा त्रिपाठी, रोहित गुप्ता, विपनेश सिंह, संजय श्रीवास्तव, राधेश्याम पासवान, एवं छात्र, साहित्यप्रेमी, और स्थानीय नागरिक उपस्थित रहे। कार्यक्रम का संचालन आयुषी दूबे ने किया, सभी का स्वागत रामरतन पाल , व धन्यवाद ज्ञापन राजीव गोंड ने किया।
