Varanasi UP..सत्तामुख के सिद्धांतहीन गठजोड़ ने समाजवाद को बिखरा दिया – प्रो. इंदीवर।

सत्तामुख के सिद्धांतहीन गठजोड़ ने समाजवाद को बिखरा दिया – प्रो. इंदीवर।

‘समाजवाद: प्रयोग और पतन’ का लोकार्पण–परिचर्चा

वाराणसी नरेंद्रदेव, जयप्रकाश और लोहिया ने समाजवाद और जनतंत्र को राष्ट्रीयता से निकला हुआ बताया था। वे इसे भारत की राष्ट्रशक्ति मानते थे। इसके बिना राष्ट्र अशक्त और निरर्थक हो जाता है। आज की सबसे बड़ी सामाजिक समस्या धर्मनिरपेक्षता का छद्म स्वरूप और जातिवाद है। उक्त विचार धर्मेंद्र सिंह एम.एल.सी. ने प्रो. इंदीवर की सद्यः प्रकाशित पुस्तक ‘समाजवाद: प्रयोग और पतन’ के लोकार्पण और पुस्तक विमर्श के अवसर पर व्यक्त किए। यह कार्यक्रम प्रो. उर्मिला मिश्र शब्द संवाद के 15वें आयोजन पर किया गया था। उन्होंने कहा कि लोहिया के बाद समाजवादी लोगों में जाति और छद्म धर्मनिरपेक्षता दोनों बुराइयाँ बढ़ी हैं। इसे राष्ट्र चेतना ही रोक सकती है।
पुस्तक के लेखक प्रख्यात समीक्षक प्रो. इंदीवर ने कहा— समाजवाद की वृक्षछाया नरेंद्र देव, जयप्रकाश और लोहिया से बनती है। इनका चिंतन देशप्रेम और जन-कल्याण की भावना से भरा था। मार्क्स की जगह गांधी के सत्य से जुड़ा था। समाजवादी राष्ट्रीय लोकतांत्रिक थे। समाजवाद का सिद्धांत उदात्त था किंतु कर्म के स्तर पर समाजवादी उसे सफलता से उतार न सके। लोहिया ने अकेले सैद्धांतिक कर्म को चरितार्थ किया था। उनके निधन के बाद समाजवादियों की सिद्धांतहीन गठजोड़ वाली सत्तामुख ने उसे बिखरा व पतनशील बना दिया।
अध्यक्षता करते हुए प्रो. दीपक मलिक ने कहा कि समाजवाद रोटी का आंदोलन नहीं, एक सांस्कृतिक आंदोलन है। यह मनुष्य को अनेक आर्थिक अभावों और मारक श्रम से मुक्त कर सांस्कृतिक जीवन का अवकाश प्रदान करता है। प्रो. सुरेंद्र प्रताप ने कहा कि समाजवाद में नैतिक अंश की प्रधानता है। समाजवाद ही श्रेणी नैतिकता तथा मत्स्य न्याय के बदले जनप्रधान नैतिकता तथा सामाजिक न्याय की स्थापना कर सकता है। लेखक ने इसे अच्छी तरह स्पष्ट किया है। पत्रकार प्रदीप कुमार ने लेखक को बधाई देते हुए कहा कि पुस्तक में समाजवाद का इतिहास है। इसमें तीनों संस्थापक नेताओं के सिद्धांतों और विचारों का सशक्त विश्लेषण हुआ है। तीनों के अहम एवं सैद्धांतिक टकराव को दिखाया गया है। कालांतर में राजनारायण-मधु लिमये के टकराव ने समाजवादी आंदोलन को बिखरा दिया और उसका पतन हो गया।
डॉ. प्रज्ञा सिंह ने समूची पुस्तक से उद्धरण प्रस्तुत करते हुए समाजवादी नेताओं के संघर्ष और उनके बिखराव को स्पष्ट किया। संचालन प्रो. श्रद्धानंद, स्वागत दयामित्र मिश्र तथा धन्यवाद ज्ञापन नरेंद्र नाथ मिश्र ने किया। कुँवर सुरेश सिंह, लाल साहब सिंह आदि ने विचार व्यक्त किए।
दूसरे सत्र में भव्य कवि गोष्ठी हुई, जिसमें प्रो. वंदना मिश्र, प्रो. इशरत जहां, डॉ. मुक्तता, डॉ. अक्षय पाण्डेय, संतोष प्रीत, बुद्धदेव तिवारी, संगीता श्रीवास्तव, नसीमा निशा, डॉ. अशोक सिंह, शिव कुमार पगला, प्रसन्न वदन चतुर्वेदी, मंजरी पाण्डेय, महेंद्र अलंकार, सिद्धनाथ शर्मा, अत्रि भारद्वाज, कंचन लता चतुर्वेदी, छाया शुक्ला, आलोक द्विवेदी, डॉ. शरद श्रीवास्तव, आनंद कृष्ण मासूम, रामअवधपाल, परसंस तिवारी, प्रताप देव, आलोक द्विवेदी, दिनेश दत्त पाठक, उषा पाण्डेय, डॉ. संगीता श्रीवास्तव, संध्या श्रीवास्तव, विनय गुप्ता तथा जोनपुरी आदि ने काव्य पाठ किया। कार्यक्रम की अध्यक्षता डॉ. चंद्रमाल शुकुमार ने की। संचालन प्रसन्नवदन चतुर्वेदी ‘अनंत’ तथा धन्यवाद ज्ञापन संतोष कुमार ने किया।

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