गंगा में नाव पर इफ्तार मामला: 14 आरोपियों की जमानत खारिज।
अदालत ने बताया गंभीर अपराध।


वाराणसी, बहुचर्चित “गंगा जी में नाव पर रोजा इफ्तार” प्रकरण में बुधवार को जिला एवं सत्र न्यायालय, वाराणसी ने अहम फैसला सुनाते हुए 14 आरोपियों की जमानत अर्जी खारिज कर दी। न्यायालय संख्या-06 के पीठासीन अधिकारी आलोक कुमार ने प्रथम जमानत प्रार्थना पत्र संख्या-949/2026 को निरस्त करते हुए मामले को गंभीर प्रकृति का अपराध माना।
क्या है पूरा मामला
यह प्रकरण थाना कोतवाली में दर्ज अपराध संख्या 65/2026 से जुड़ा है। आरोप है कि गंगा नदी में नाव पर इफ्तार पार्टी आयोजित की गई, जिसमें मांसाहार का सेवन किया गया और उसके अवशेष नदी में फेंके गए। वादी रजत जायसवाल ने इसे धार्मिक भावनाओं को आहत करने वाला कृत्य बताते हुए शिकायत दर्ज कराई थी।
अभियोजन पक्ष के तर्क
अभियोजन की ओर से प्रस्तुत दलीलों में कहा गया कि यह कृत्य सुनियोजित था और इससे सामाजिक सौहार्द को नुकसान पहुंचाने का प्रयास किया गया। घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर प्रसारित होने से जनाक्रोश बढ़ा। गंगा की धार्मिक महत्ता को देखते हुए इसे अत्यंत संवेदनशील मामला बताया गया।
विवेचना में क्या मिला
पुलिस जांच में वायरल वीडियो के आधार पर आरोपियों की पहचान की गई। प्रत्यक्षदर्शियों के बयान भी दर्ज किए गए, जिनमें नाव पर इफ्तार आयोजन और मांसाहार के सेवन की पुष्टि बताई गई। जांच में यह भी सामने आया कि वीडियो जानबूझकर रिकॉर्ड कर प्रसारित किया गया।
बचाव पक्ष की दलीलें
बचाव पक्ष ने आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि मामले को राजनीतिक रूप दिया जा रहा है। वीडियो की प्रमाणिकता पर भी सवाल उठाए गए। साथ ही यह तर्क दिया गया कि आरोपियों का कोई आपराधिक इतिहास नहीं है और केवल वीडियो के आधार पर गंभीर धाराएं लगाना उचित नहीं है।
न्यायालय की टिप्पणी
न्यायालय ने कहा कि मामला केवल एक घटना नहीं, बल्कि सार्वजनिक शांति और सामाजिक सौहार्द से जुड़ा है। गंगा की धार्मिक गरिमा को ध्यान में रखते हुए इस प्रकार के कृत्य को गंभीर माना गया। अदालत ने यह भी कहा कि सोशल मीडिया पर प्रसार ने मामले की गंभीरता और बढ़ा दी है।
जमानत खारिज करने के आधार
न्यायालय ने निम्न आधारों पर जमानत अर्जी खारिज की—
अपराध की गंभीरता
धार्मिक भावनाओं को आहत करने का आरोप
सामाजिक सौहार्द पर संभावित प्रभाव
प्रथम दृष्टया साक्ष्यों की पुष्टि
साक्ष्य प्रभावित करने की आशंका
अंतिम आदेश
अदालत ने स्पष्ट किया कि वर्तमान परिस्थितियों में आरोपियों को जमानत देना न्यायहित में नहीं है। सभी 14 आरोपियों की जमानत अर्जी निरस्त कर दी गई।
प्रशासन अलर्ट मोड में
फैसले के बाद प्रशासन ने शहर में सतर्कता बढ़ा दी है। धार्मिक दृष्टि से संवेदनशील वाराणसी में इस मामले को लेकर सुरक्षा व्यवस्था पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है।
निष्कर्ष
यह मामला अब स्थानीय सीमाओं से निकलकर व्यापक चर्चा का विषय बन चुका है। अदालत के इस फैसले को धार्मिक स्थलों की गरिमा और सामाजिक समरसता की रक्षा के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। वादी के अधिवक्ता शशांक शेखर त्रिपाठी आशुतोष शुक्ला रहे।
