Varanasi UP…डॉ भीमराव अंबेडकर ने मौन को मानवता और राष्ट्र के लिए कहा था खतरनाक,अशोक विश्वकर्मा।

डॉ भीमराव अंबेडकर ने मौन को मानवता और राष्ट्र के लिए कहा था खतरनाक,अशोक विश्वकर्मा।

वाराणसी ऑल इंडिया यूनाइटेड विश्वकर्मा शिल्पकार महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अशोक कुमार विश्वकर्मा ने डॉ भीमराव अंबेडकर जयंती पर उन्हें स्मरण करते हुए कहा कि बाबासाहेब ने एक बार बहुत ही सारगर्भित बात कही थी। यदि आप में गलत को गलत कहने की क्षमता नहीं है, तो आपकी प्रतिभा व्यर्थ है। बाबा साहब के यह वाक्य वर्तमान समय में ज्यादा प्रासंगिक तथा उस ‘शिक्षित और सभ्य’ समाज के चेहरे पर एक करारा तमाचा है, जो अपनी सुविधानुसार मौन का मुखौटा पहन लेता है। शिक्षा का मकसद केवल पेट पालना नहीं, बल्कि नैतिक चरित्र का निर्माण करना है। बाबासाहेब ने ‘शिक्षित बनो’ का नारा इसलिए दिया ताकि हम अपने अधिकारों और दूसरों पर हो रहे अन्याय के विरुद्ध न्याय के लिए आवाज उठा सके। उन्होंने कहा था कि जो शिक्षा हमें सच बोलने का साहस नहीं देती, वह शिक्षा केवल एक ‘रोजगार प्रशिक्षण’ है। सुविधाजनक मौन की बीमारी के मुख्य लक्षण है मुझे क्या लेना-देना” “विवाद में पड़ने से करियर खराब हो जाएगा।”अभी समय सही नहीं है।”यह डर उस प्रतिभा का अपमान है, जो समाज ने आपको दी है। बाबा साहेब का पूरा जीवन संघर्ष की गाथा है; अगर वह भी अपनी प्रतिभा का उपयोग केवल अपनी व्यक्तिगत सुख-सुविधा के लिए करते, तो आज करोड़ों लोगों का भाग्य अंधकारमय होता। शिक्षित वर्ग अक्सर अपने मौन को ‘शालीनता’ या ‘शांतिप्रियता’ का नाम देता है। लेकिन याद रखिए, *अन्याय के समय चुप रहना अपराधी का साथ देने के बराबर है।जब एक शिक्षित और प्रतिभाशाली व्यक्ति गलत को गलत कहने से डरता है, तो वह समाज में एक गलत मिसाल कायम करता है। वह आने वाली पीढ़ी को सिखाता है कि
“सच्चाई से ज्यादा महत्वपूर्ण सर्वाइवल (Survival) है।” यह सोच किसी भी राष्ट्र की प्रगति के लिए सबसे बड़ा खतरा है। बाबासाहेब के सपनों का भारत तभी बनेगा जब हमारा शिक्षित समाज अपनी ‘बौद्धिक नपुंसकता’और मौन को त्यागकर गलत के खिलाफ आवाज उठाना शुरू करेगा।

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