रुद्र काशीकेय” की बहती गंगा जब काशी केवल शहर नहीं, एक जीवित
संस्कृति थी।
शिवप्रसाद मिश्र ‘रुद्र’ की आँखों से दिखती बनारस कीआत्मा।
काशी को केवल नक्शे पर खोजा नहीं जा सकता। उसे महसूस करना पड़ता है। उसकी गलियों की धूल, घाटों की सीढ़ियाँ, मंदिरों की घंटियाँ, पान की दुकानों पर चलती बहसें और गंगा की धारा सब मिलकर उस काशी का निर्माण करते हैं, जिसे हिंदी के महान साहित्यकार शिवप्रसाद मिश्र ‘रुद्र’ ने अपने बहती गंगा उपन्यास में अमर कर दिया। जो काशी के 200 वर्षों का इतिहास अपने आप में समेटे हुए हैं।
रुद्र जी का साहित्य पढ़ते हुए लगता है, जैसे कोई पुराना बनारसी हमारे कंधे पर हाथ रखकर धीरे-धीरे शहर घुमा रहा हो। उनकी प्रसिद्ध कृति बहती गंगा केवल उपन्यास नहीं, बल्कि उस कालखंड की काशी का जीवंत सांस्कृतिक दस्तावेज है। उसमें काशी साँस लेती है, बोलती है, हँसती है और अपने पूरे फक्कड़पन के साथ पाठक के सामने खड़ी हो जाती है।
उस समय की काशी में जीवन की रफ्तार आज जैसी तेज़ नहीं थी। वहाँ समय घड़ी की सुइयों से नहीं, बल्कि मंदिरों की आरती और घाटों की हलचल से चलता था। भोर होते ही गंगा किनारे वैदिक मंत्रों की ध्वनि उठती, सूरज की पहली किरण जल पर सुनहरी चादर बिछाती और पूरा वातावरण आध्यात्मिक आभा से भर जाता। अस्सी से पंचगंगा तक फैले घाट केवल स्नान या पूजा के स्थान नहीं थे, बल्कि समाज के जीवंत विश्वविद्यालय थे।
घाटों पर कोई शास्त्रार्थ कर रहा होता, कहीं कोई संत भजन गा रहा होता, तो कहीं कोई नाविक जीवन का दर्शन समझा रहा होता, कहीं भगड़ भिक्षुक की लावणी की गूंज , तो कहीं दुलारी की कंठ से निकली कजरी की आवाज यही ठईया झूलनी हैरानी हो रामा, कहीं सुंदर की कजरी की तान नागर नैया जाला काले पनिया रे हरी, काशी के वे गुंडे जिन्हें स्वतंत्रता संग्राम सेनानी की दृष्टि से देखा जाना न्याय संगत होगा। काशी की यही विशेषता थी , यहाँ विद्वता और लोकजीवन साथ-साथ चलते थे। संस्कृत के पंडित और ठेठ बनारसी मल्लाह दोनों इस शहर की आत्मा थे।
रुद्र जी की काशी की सबसे बड़ी विशेषता उसका अपनापन था। गलियाँ भले संकरी थीं, लेकिन रिश्ते बेहद विशाल थे। हर मोहल्ला एक परिवार की तरह था। चौक, मैदागिन, गोदौलिया या लक्सा , हर क्षेत्र की अपनी अलग पहचान और संस्कृति थी। लोग एक-दूसरे के सुख-दुख में बिना बुलाए शामिल हो जाते थे।
उस दौर की काशी में संगीत हवा में घुला रहता था। ठुमरी, दादरा, चैती और कजरी केवल मंचों तक सीमित नहीं थे; वे जनजीवन का हिस्सा थे। किसी हवेली से उस्ताद की रियाज़ सुनाई देती, तो किसी मंदिर से शंख और घंटियों की ध्वनि। ऐसा लगता था ,मानो पूरा शहर एक अनवरत संगीत साधना में लीन हो।
काशी की पहचान उसका फक्कड़पन भी था। यहाँ जीवन को बोझ की तरह नहीं, उत्सव की तरह जिया जाता था। आर्थिक अभाव हो सकते थे, लेकिन मन का वैभव असीम था। बनारसी मस्ती में एक गहरी दार्शनिकता छिपी रहती थी। यही कारण है कि यहाँ मृत्यु भी भय का विषय नहीं, बल्कि मोक्ष का उत्सव मानी जाती थी।
रुद्र जी के समय की काशी परंपरा और परिवर्तन के बीच संतुलन बनाए हुए थी। अंग्रेज़ी शासन का प्रभाव बढ़ रहा था, आधुनिक शिक्षा आ रही थी, लेकिन काशी ने अपनी आत्मा को बचाए रखा। वह आधुनिक भी हो रही थी और अपनी जड़ों से जुड़ी भी थी।
आज की काशी बदल चुकी है। चौड़ी सड़कें हैं, चमकती रोशनियाँ हैं, भीड़ है, भागदौड़ है। लेकिन पुरानी काशी की वह आत्मीयता, वह धीमा संगीत, वह गली-कूचों का अपनापन अब स्मृतियों में अधिक दिखाई देता है।
फिर भी, जब कोई सुबह-सुबह गंगा किनारे खड़ा होकर उगते सूरज को देखता है, जब कहीं दूर मंदिर की घंटी सुनाई देती है, या जब किसी पुरानी गली से बनारसी ठहाका गूँजता है , तब महसूस होता है कि रुद्र जी की काशी अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुई। वह अब भी कहीं न कहीं बह रही है, ठीक उनकी कृति “बहती गंगा” की तरह।
