Varanasi UP…प्रधानमंत्री का विजन और आर्थिक*राष्ट्रवाद 

प्रधानमंत्री का विजन और आर्थिक*राष्ट्रवाद 

आज जब दुनिया बारूदी धुएं और आर्थिक अस्थिरता के दोराहे पर खड़ी है, भारत के प्रधानमंत्री का आह्वान केवल एक ‘सलाह’ नहीं, बल्कि एक ‘सुरक्षा कवच’ है। ईरान-इजरायल तनाव और वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच प्रधानमंत्री द्वारा संसाधनों के संयमपूर्ण उपयोग की बात करना उनकी दूरदर्शिता का प्रमाण है।

प्रधानमंत्री जी ने सोना, पेट्रोल, डीजल और खाद जैसे आयातित संसाधनों पर निर्भरता कम करने का सुझाव एक रणनीतिक सोच के तहत दिया है।

भारत अपनी जरूरत का अधिकांश तेल और सोना विदेशों से खरीदता है। जब हम सोना या पेट्रोल कम खर्च करते हैं, तो देश का कीमती डॉलर बचता है, जो संकट के समय अर्थव्यवस्था को टूटने से बचाता है।

खाड़ी देशों में तनाव का सीधा असर कच्चे तेल की कीमतों पर पड़ता है। सप्लाई चेन बाधित होने से महंगाई बढ़ने का डर रहता है। ऐसे में ‘बचत’ ही सबसे बड़ा हथियार है।

युद्ध के कारण फर्टिलाइजर की वैश्विक कीमतों में उछाल आता है। प्रधानमंत्री का जोर ‘नैनो यूरिया’ और प्राकृतिक खेती पर इसलिए है, ताकि भारतीय किसान वैश्विक बाजारों के उतार-चढ़ाव का गुलाम न रहे।

ईरान युद्ध का असर पूरी दुनिया पर पड़ रहा है, लेकिन प्रधानमंत्री मोदी की नीतियों ने भारत को इसके कारण लगने वाले झटके से बचने के लिए तैयार किया है। जहां विकसित देश महंगाई से त्राहि-त्राहि कर रहे हैं, भारत अपनी घरेलू मांग और मजबूत राजकोषीय नीतियों के दम पर स्थिर खड़ा है।

जब दुनिया युद्ध की आग में झुलस रही होती है, तब एक सच्चा जननायक अपने देशवासियों कोओ केवल उपदेश नहीं देता, बल्कि उन्हें आने वाले कल के लिए मानसिक और आर्थिक रूप से सशक्त बनाता है।

यह कोई साधारण समय नहीं है, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व और उनकी नीतियां आज भारत के लिए एक ‘अभेद्य दुर्ग’ का निर्माण कर रही हैं।

जब दुनिया सप्लाई चेन के लिए तरस रही है, मोदी जी आत्मनिर्भर भारत के मंत्र से भारत को वैश्विक

मैन्युफैक्चरिंग हब बना रहे हैं।

कूटनीति के मोर्चे पर भारत आज न किसी के दबाव में है, न किसी के पक्ष में,भारत केवल अपने ‘राष्ट्रहित’ के पक्ष में है। रूस से सस्ता तेल खरीदना हो या खाड़ी देशों के साथ संबंधों का संतुलन, मोदी जी की ‘इंडिया फर्स्ट’ नीति का लोहा पूरी दुनिया मान रही है।

प्रधानमंत्री जब देश से त्याग और बचत की अपील करते हैं, तो वह एक शासक की तरह नहीं, बल्कि परिवार के उस ‘अभिभावक’ की तरह बोलते हैं जो आने वाले तूफान की आहट को सबसे पहले सुन लेता है।

विश्व के इस महा-संकट से प्रधानमंत्री भारत को अपनी राष्ट्रनीति और रणनीति के अनूठे मेल से निकालेंगे। डिजिटल क्रांति से लेकर बुनियादी ढांचे तक, और सीमाओं की सुरक्षा से लेकर गरीबों की थाली तक हर कदम एक सुनियोजित भविष्य की गाथा लिख रहा है।

आज पूरा देश देख रहा है कि जब वैश्विक क्षितिज पर अंधेरा गहराता है, तब भारत का नेतृत्व एक प्रकाश स्तंभ बनकर उभरता है। प्रधानमंत्री के आह्वान पर हमारा छोटा सा त्याग भारत को विश्वगुरु की गरिमा दिलाने में सबसे बड़ी आहुति बनेगा। यह समय संशय का नहीं, बल्कि अपने नेतृत्व पर विश्वास कर विकसित भारत के संकल्प के साथ आगे बढ़ने का है।

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