घिनौनी जातिवादी राजनीति पर उतरे सत्ता के भूखे नेता

धारा लक्ष्य समाचार

वोट के लिए महापुरुषों को निशाना बनाना बना फैशन! राणा सांगा ही नहीं बाबा तुलसीदास जी एवं मंदिरों को भी नहीं छोड़ रहे हैं कूपमंडूप नेता!

तथाकथित सेकुलर वादियों को पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद में हिंदुओं का नहीं दिख रहा है दर्द व पलायन?

अधकचरा ज्ञान बांटकर बहुसंख्यक समुदाय को जातियों में तोड़ने की हो रही है गंदी साजिश

कृष्ण कुमार द्विवेदी (राजू भैया)

👉 उन्हें बहुसंख्यक हिंदू समाज को जातियों में तोड़कर मुसलमानों का साथ पाकर बस सत्ता चाहिए ?इसके लिए उन्हें किसी भी शर्मनाक स्थिति में किसी भी गंदे नाले में स्नान करना पड़े ?समाजवादी पार्टी के सहित अन्य भाजपा के विपक्षी दलों की महिम बस इसी दिशा में अग्रसर है !

सांसद रामजीलाल सुमन के बाद अब सपा के राष्ट्रीय महासचिव इंद्रजीत सरोज जातिवादी राजनीति का नंगा नाच बेशर्मी से करते दिखाई दे रहे हैं? हालत यह हैं कि महापुरुषों को निशाना बनाया जा रहा है !श्री रामचरितमानस महाग्रंथ की रचना करने वाले बाबा तुलसीदास को निशाना बनाया जा रहा है! यही नहीं हिंदुओं की आस्था के केंद्र मंदिरों एवं संतों पर भी अधकचरा ज्ञान उड़ेल कर सत्ता के भूखे नेता सत्ता में वापस लौटने का सपना देख रहे हैं ?शर्म तो तब आती है जब पश्चिम बंगाल में मुर्शिदाबाद से हो रहा हिंदुओं का पलायन भी इन्हें नहीं नजर आता??

बहुसंख्यक हिंदुओं की खुलेआम पैरवी करके देश व कई प्रदेशों में सत्ता पर काबिज भाजपा को सत्ता से उखाड़ने के लिए सपा एवं वामपंथी तथा कांग्रेस जैसे विपक्षी दल जातिवादी राजनीति की निम्न पर पराकाष्ठा पर उतरे दिखाई दे रहे हैं? एक समय ऐसा था जब समाजवादी पार्टी में रहकर स्वामी प्रसाद मौर्य ब्राह्मणों को खुलेआम गाली दे रहे थे। रामायण एवं रामचरितमानस को आग लगा रहे थे! तो वहीं वर्तमान में सपा सांसद राम जी लाल सुमन एवं सपा के राष्ट्रीय सचिव इंद्रजीत सिंह सरोज देश के महापुरुषों, मंदिरों, संतो यहां तक कि संत बाबा तुलसीदास जी को निशाना बनाकर बहुसंख्यक समाज की आस्था पर कुठाराघात कर रहे हैं।

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के सुपरहिट बयान कटेंगे तो बटेंगे की काट के लिए भाजपा के विपक्षी दल तुष्टीकरण के राजनीति करते हुए बहुसंख्यक समाज को जातियों में काटने के लिए जुटे हुए हैं? दरअसल गलती उनकी नहीं है। मामला यह है कि आजादी के बाद हिंदुओं को बांटकर मुसलमानों को मिलाकर सत्ता पर काबिज रहने का मजा उपरोक्त दलों के नेता लुटते आए हैं। दुर्भाग्य है कि तुष्टीकरण एवं जातिवादी राजनीति के चलते बहुसंख्यक समाज की आस्था को बिना सोचे समझे, किसी भी समय अपमानित करना सस्ते प्रचार के भूखे कई नेताओं का शगल बन चुका है! पूरे देश में महापुरुषों पर हमले किए जा रहे हैं! भारतीय संस्कृति पर नए-नए सस्ते बयान जारी करके वोटो की खोज जारी है! नेताओं का गटर ज्ञान तो देखिए ऐसा बोलते हैं जैसे श्री रामचरितमानस एवं गजनी के आने के दौरान वह पृथ्वी पर मौजूद रहे हो? और उन्होंने सब अपनी आंखों से देखा हो?

इन नेताओं के भेजे में यह बात घुसती ही नहीं कि जागृत हो चुका बहुसंख्यक समाज अब अपना भला- बुरा समझ रहा है! ऐसे नेताओं को केवल एक ही रास्ता नजर आता है। बहुसंख्यक समाज की एकता को तोड़ो? मुसलमानों को मिलाओ? सत्ता पर काबिज हो! और फिर अन्य जातियों को छोड़कर केवल अपनी जाति का उद्धार करो? शर्म तो तब आती है जब भाजपा के विपक्षी दलों के बड़े नेता भी सस्ते एवं निम्न बयान देने वाले नेताओं का संरक्षण करते नजर आते हैं ?संविधान की दुहाई देने वाले नेता यह भूल जाते हैं कि संविधान में यदि सभी को बराबर का अधिकार है। तो वही अधिकार बहुसंख्यक समुदाय का भी है। मुर्शिदाबाद में खुलेआम शांतिदूतो की भीड़ हिंदुओं के घरों, दुकानों को जलाती है। बहन बेटियों व बुजुर्गों पर हमले करती है। हालत यह हो जाते हैं की सैकड़ो की संख्या में बहुसंख्यक हिंदुओं को अल्पसंख्यक बाहुल्य मुर्शिदाबाद से पलायन करना पड़ता है।

लेकिन आंसुओं से भींगे, बर्बादी से जूझते ,अपनों की सुरक्षा के लिए चिंतित हिंदू समाज का दर्द अथवा उनके आंसू ना तो पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को दिखाई देते हैं? और ना ही सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव अथवा सपा सांसद रामजीलाल सुमन या फिर सपा के राष्ट्रीय सचिव इंद्रजीत सिंह सरोज को? हद तो तब हो जाती है जब मुसलमानों के बहुत बड़े शुभचिंतक बनने वाले तथाकथित सेकुलरवादी नेताओं को पसमांदा मुसलमानों का दर्द भी नजर नहीं आता ?पसमांदा मुसलमान आजादी के बाद से अपना अधिकार मांग रहे हैं! लेकिन वक्फ बोर्ड बिल के संशोधन के बाद मुसलमानों को इसके नाम पर आंदोलन की घुट्टी पिलाई जाती है? जब पसमांदा मुस्लिम इसका विरोध करते हैं तब तथाकथित सेकुलरवादियों की सांस फूलती नजर आती है!

जाहिर है कि ऐसी स्थिति में सत्ता के लिए तड़प रहे जातिवादी मानसिकता के नेता निम्न स्तर के बयानों का सहारा लेकर उसमें कुर्सी खोजते नजर आते हैं? स्थिति एकदम साफ है आप
बहुसंख्यक समाज की आस्था से खिलवाड़ करेंगे। उससे वोट भी चाहेंगे ।बहुसंख्यक समुदाय के महापुरुषों ,उनके देवी- देवताओं, मंदिरों का अपमान करेंगे! उनसे समर्थन भी चाहेंगे! यह कैसे हो सकता है ?दलितों के बड़े रहनुमा बनने का नाटक करेंगे! लेकिन गेस्ट हाउस कांड को याद नहीं रखेंगे? उपरोक्त स्थिति साफ दर्शाती है कि ऐसे निम्न मानसिकता वाले नेताओं को केवल सत्ता दिखाई देती है। यह सकारात्मक विपक्ष का धर्म भी नहीं निभा पाए? आम जनता के मूलभूत अधिकारों के लिए सड़क पर उतरकर संघर्ष करने की उनकी हिम्मत भी नहीं दिखाई देती?

डॉ राम मनोहर लोहिया जी कहते थे सच्चा समाजवादी 5 वर्षों तक इंतजार नहीं करता! वह सड़क पर उतरकर संघर्ष करता है। लेकिन यहां संघर्ष पीछे छूट गया? यहां आज के समाजवाद ने तुष्टिकरण, संपत्ति – संतति की शर्मनाक घुट्टी पीली है? डॉ लोहिया जी रामायण मेले का आयोजन करते थे ! लेकिन आज के समाजवादी मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम जी के मंदिर में भी नहीं जा सकते । जहां तक सवाल है करणी सेना का! तो उसे भी गहरे चिंतन की आवश्यकता है ।क्योंकि जातिवादी राजनीति करने वाले सियासतदानों के जाल में कई बार करणी सेना भी फसती नजर आ रही है?सस्ते, हिंसक बयानों का जवाब अच्छे ढंग से दिया जाना चाहिए! क्योंकि हिंसा का लोकतंत्र में कोई स्थान नहीं है! इससे सभी को बचना चाहिए।

जातिवादी राजनीति के सियासतदानों को तुष्टीकरण के आगे न सही दिखता है ना गलत दिखता है? उनकी वैचारिक बुद्धि भी सत्य और असत्य का खोज नहीं कर पाती? भारत देश के मंदिर भारत की आत्मा है ।विदेश में भी तमाम मंदिर विद्यमान है। परम संत तुलसीदास जी महाराज एवं उनकी श्री रामचरितमानस विश्व के करोड़ों सनातन प्रेमियों के लिए आस्था का केंद्र है। इस पर हमला करके इसकी निंदा करके सत्ता खोजना इतना घृणित उपाय है कि उसकी निम्न से निम्न शब्दों में भी निंदा नहीं की जा सकती! एकता को भारत देश की खूबसूरती बताने वाले नेताओं को सोचना होगा। भाईचारा अथवा एकता एक पक्ष से नहीं होती। इसके लिए सभी को मिलकर, सभी की आस्थाओं का सम्मान करके, सभी को आगे आना होगा।आजादी के बाद से आज तक केवल मुसलमान को सत्ता के भूखे भेड़ियों ने वोट बैंक ही समझा है?

उनकी तरक्की पर ईमानदारी से काम करने की उनकी कभी हिम्मत ही नहीं रही। वैसे बहुसंख्यक समुदाय एवं सनातन पर आज नहीं पूर्व में भी बड़े-बड़े हमले हुए हैं! लेकिन कहावत है आसमान की ओर मुंह करके थूकने पर गंदगी थूकने वाले के मुंह पर ही गिरती है? इसलिए जरूरी है कि जनता की समस्याओं के लिए सड़क पर उतरकर संघर्ष की राजनीति की जाए।बहुसंख्यक समाज इसी देश में रहता है। इस सत्य को समझा जाए। सभी की आस्था का सम्मान करते हुए शुद्ध एवं सकारात्मक राजनीति के रास्ते से सत्ता का रास्ता खोजा जाए।लेकिन घृणित राजनीति करने वाले नेता शायद ही यह समझे?? घिनौनी जातिवाद की राजनीति करके सत्ता को पाने की उनकी ललक देश व समाज में विघटन पैदा कर रही है?

भाईचारा, लोकतंत्र की रक्षा इसकी समस्त जिम्मेदारी केवल बहुसंख्यक समाज की है इस पर खुले दिल से आत्म मंथन की आवश्यकता है! मुर्शिदाबाद में जो हुआ उसमें बांग्लादेश एवं आताताई लोगों की भूमिका भी प्रारंभिक जांच में सामने आई है?देश के किसी कोने में बहुसंख्यक समाज पर हमला हो। तथाकथित सेकुलरवादी नेताओं के मुंह की जुबान तालू में चिपक जाती है? यह बोलेंगे तो तुष्टिकरण का जहर ही उगलेंगे? ऐसे में जरूरी है कि देश एवं प्रदेशों में काबिज सरकारें , सत्ता के लिए बेचैन कुत्सित मासिकता के नेताओं पर कड़ी कार्यवाही करें। ताकि देश की खूबसूरती व सामाजिकता को जातिवाद के जहर बुझे तीरों से बचाया जा सके!!!!

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