Varanasi UP….संत रविदास जी की वाणी में आत्मा की स्वतंत्रता और निराकार ईश्वर की भक्ति आलोकित होती है:अशोक विश्वकर्मा

 

संत रविदास जी की वाणी में आत्मा की स्वतंत्रता और निराकार ईश्वर की भक्ति आलोकित होती है:अशोक विश्वकर्मा

वाराणसी संत रविदास जी की वाणी में आत्मा की स्वतंत्रता और निराकार ईश्वर की भक्ति का वर्णन मिलता है, जिसमें “हंस” (आत्मा) को अकेला माना गया है। “उड़ जा हंस अकेला” या “झूठा ब्रह्म अकेला” जैसे पद उनके दार्शनिक विचारों को दर्शाते हैं।
संत रविदास जी का एक प्रसिद्ध पद है जो जीवन की नश्वरता और आत्मा के अकेलेपन को दर्शाता है:
“जीवन चारि दिवस का मेला रे।
बांभन झूठा, वेद भी झूठा, झूठा ब्रह्म अकेला रे।।
मंदिर भीतर मूरति बैठी, तीरथ में अकेला रे।
कहै रैदास सुनहु रे भाई, कोई न अपना बेला रे।।”
अर्थ: यह जीवन केवल चार दिनों का मेला है। संसार के बाहरी आडंबर वेद-बांभन मिथ्या हैं। ईश्वर निराकार है, जो ब्रह्म अकेला ही सत्य है। मंदिर की मूरत और तीर्थ भी माया हैं, अंत में आत्मा अकेली ही जाती है।

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