Varanasi UP…तकनीक ने बढ़ाई दूरी, सोशल मीडिया तक सिमट गया त्योहार

तकनीक ने बढ़ाई दूरी, सोशल मीडिया तक सिमट गया त्योहार

रंगत खोते परंपरागत – त्यौहार: अशोक विश्वकर्मा

आधुनिक तकनीकी और बाजारीकरण के दौर ने संपूर्ण सामाजिक व्यवस्था को बदल कर रख दिया है। i सने परंपरागत सामाजिक पर्व उत्सव और त्योहार के रस्म को सबसे ज्यादा प्रभावित किया है। जिसके चलते प्रमुख त्योहार अपनी रंगत खोते जा रहे है और त्योहार सिर्फ औपचारिकता बन कर रह गए हैं। किसी के पास फुरसत ही नहीं है कि त्योहारों के दिन लोगों के दुख दर्द पूछ सकें और आपस में खुशियां बांट सके, सब धन कमाने की होड़ में लगे हैं। हमारे पूर्वजों और बुजुर्गों ने परंपराओं तथा त्योहारों की रंगत कभी फीकी नहीं पड़ने दी, किंतु इस अर्थ युग में सब कुछ बदल गया है। त्योहार के दिन भी हम अपनो से, समाज से पूरी तरह नहीं जुड़ पाते, बात तो हम एकता, प्रेम, भाईचारा और सद्भाव की करते हैं, लेकिन आज सामुदायिक भावना की सर्वाधिक कमी देखने को मिलती है, शहरों में लोग अपनी संस्कृति से दूर होकर एकल जीवन जी रहे हैं। परंपरागत पर्व और त्योहारों का उल्लास जो कभी सामुदायिक भाईचारा और सादगी का प्रतीक था समय के साथ आज फीका पड़ता जा रहा है। आधुनिक जीवन शैली भौतिकवाद और डिजिटल दुनियां ने उत्साह के इस स्वरूप को काफी हद तक बदल दिया है। व्यस्त और तनावपूर्ण जीवन शैली के चलते काम का बोझ इतना बढ़ गया है जिससे लोगों के पास त्योहारों की तैयारी के लिए समय और ऊर्जा की कमी रहती है। पहले पूरा मोहल्ला या गांव मिलकर त्यौहार मनाता था लेकिन आज शहरीकरण और फ्लैट कल्चर के कारण पड़ोसी भी एक दूसरे को कम ही जानते हैं, जिससे वह मिलजुल कर खुशियां बांटने वाला माहौल धीरे-धीरे विलुप्त होता जा रहा है। डिजिटल और वर्चुअल दुनियां में बच्चों और युवाओं का ध्यान अब रंग बिरंगी गलियों के बजाय मोबाइल, सोशल मीडिया और वीडियो गेम्स में अधिक रहने लगा है। त्योहार अब पौराणिक संस्कृति से दूर होकर मार्केटिंग का जरिया बन गया है। हर चीज यहां तक की मिठाइयां और सजावट की वस्तुएं भी आसानी से ऑनलाइन उपलब्ध होने के कारण उनके इंतजार का रोमांच खत्म हो गया है। बढ़ती महंगाई में त्योहारों पर होने वाला बेतहाशा खर्च आम लोगों के लिए भारी पड़ने लगा है। जिससे वह सादगी और त्योहार से दूर रहने को मजबूर है। त्योहारों पर मिलने जुलने के बजाय अब व्हाट्सएप या सोशल मीडिया पर बधाई संदेश भेजना आम हो गया है। जिससे व्यक्तिगत मेलजोल, स्पर्श और प्यार कम हो गया है। नई पीढ़ी की रुचि और प्राथमिकताएं अलग हो गई है, जिससे पुरानी परंपराओं को वह अब उत्साह से नहीं मनाते हालांकि कुछ जगहों पर त्यौहार अब भी पारंपरिक जोश के साथ मनाए जाते हैं। लेकिन बड़े पैमाने पर इसमें व्यावसायिकता और औपचारिकता का रंग ज्यादा दिखाई देने लगा है। आइए इस होली पर संकल्प लें कि हम मर्यादा का उत्सव मनाएंगे, विभाजन नहीं विश्वास को बढ़ाएंगे और सद्भावपूर्ण उत्साह को अपनाएंगे, जब होली के रंग हमारे चरित्र और आचरण में उतरेंगे तभी यह पर्व वास्तव में सार्थक और प्रेरणादायी बनेगा। त्योहारों की रस्म अदायगी से यह लगता है कि हमारी पुरानी पीढिय़ों के साथ हमारे त्योहार भी विदा हो रहे हैं।

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