धारा लक्ष्य समाचार पत्र
बाराबंकी,जनपद बाराबंकी का जिला सरकारी अस्पताल एक बार फिर स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर सवालों के घेरे में आ गया है। ताज़ा मामला आंखों की जांच से जुड़ा है,जहां मोतियाबिंद के मरीजों के लिए आवश्यक आईओएल पावर मापने वाली ए-स्कैन बायोमेट्री मशीन लंबे समय से खराब बताई जा रही है।

प्राप्त जानकारी के अनुसार, एक समाचार पत्र के जिला संवाददाता अपनी पत्नी की आंखों की जांच कराने जिला अस्पताल पहुंचे। वहां मौजूद चिकित्सक डॉ. संजय बाबू ने जांच के दौरान मोतियाबिंद की पुष्टि करते हुए आगे की आवश्यक जांच बाहर से कराने की सलाह दी और एक निजी क्लीनिक का नाम भी सुझाया।
जब इस पर सवाल उठाया गया कि जिला अस्पताल में ऑपरेशन होने के बावजूद जांच बाहर क्यों कराई जा रही है,तो डॉक्टर ने बताया कि अस्पताल में मशीन उपलब्ध है,लेकिन वह वर्तमान में खराब है।
सीएमएस से शिकायत पर बढ़ा विवाद
मामले को लेकर पत्रकार ने मुख्य चिकित्सा अधीक्षक ( सी एम एस ) डॉ. जे.पी. मौर्य से शिकायत की। सीएमएस ने बताया कि मशीन खराब होने की जानकारी उनके संज्ञान में आई है और इसे ठीक कराने के लिए प्रस्ताव भेजा जाएगा।
हालांकि,शिकायत के बाद डॉक्टर और पत्रकार के बीच तीखी बहस भी हुई। आरोप है कि डॉक्टर ने नाराज़गी जाहिर करते हुए कहा कि यदि यहां जांच संभव नहीं है तो मरीज कहीं और,जैसे लखनऊ के लोहिया संस्थान में जांच करा सकते हैं। इस पर पत्रकार ने खर्च का मुद्दा उठाया,जिससे बाद बातचीत का लहजा तीखा हो गया।
बताया जा रहा है कि बहस के दौरान डॉक्टर द्वारा कथित तौर पर अनुचित टिप्पणी भी की गई,जिससे अस्पताल में मौजूद अन्य लोगों के सामने स्थिति असहज हो गई। इस घटना ने डॉक्टरों के व्यवहार पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं।

मरीजों पर आर्थिक बोझ
जिला अस्पताल में यह जांच सामान्यतः नि:शुल्क होनी चाहिए,लेकिन मशीन खराब होने के कारण मरीजों को निजी क्लीनिक में ₹300–₹500 तक खर्च करना पड़ रहा है। इससे गरीब और मजदूर वर्ग के मरीजों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ रहा है।
स्वास्थ्य मंत्री का निर्देश
प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री बृजेश पाठक ने स्पष्ट कहा है कि सभी मरीजों को सरकारी अस्पतालों में बेहतर और नि:शुल्क इलाज मिलना चाहिए तथा किसी भी प्रकार की लापरवाही या अनियमितता बर्दाश्त नहीं की जाएगी।
सीएमओ ने दिए जांच के आदेश
मुख्य चिकित्सा अधिकारी ( सी एम ओ ) डॉ. अवधेश कुमार यादव ने मामले की जांच के आदेश दिए हैं। उन्होंने कहा कि दोषी पाए जाने पर संबंधित के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी और खराब मशीन को जल्द ठीक कराने के निर्देश दिए गए हैं।
बड़ा सवाल
सबसे अहम सवाल यह है कि यदि जांच मशीन लंबे समय से खराब थी,तो अब तक इसे ठीक क्यों नहीं कराया गया? क्या इसकी वजह से मरीजों को मजबूरन निजी क्लीनिकों का सहारा लेना पड़ रहा है?
