काशी से निषाद समाज को एकजुटता और अधिकारों के लिए संघर्ष का संदेश।
वाराणसी। निषाद पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं उत्तर प्रदेश सरकार में मत्स्य विभाग के कैबिनेट मंत्री डॉ. संजय कुमार निषाद ने काशी की पावन धरती से निषाद, बिंद और केवट समाज को संबोधित करते हुए एकजुटता, अधिकारों की रक्षा और समग्र विकास का आह्वान किया। उन्होंने अपने संबोधन की शुरुआत बाबा विश्वनाथ और मां गंगा का स्मरण करते हुए की तथा उपस्थित जनप्रतिनिधियों, अतिथियों और समाज के लोगों का अभिनंदन किया।

डॉ. निषाद ने बताया कि बीते एक महीने से वे वाराणसी और आसपास के क्षेत्रों का लगातार दौरा कर रहे हैं, जहां उन्होंने समाज के लोगों की समस्याओं और भावनाओं को करीब से समझा। उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि कुछ लोगों में उनके प्रति नाराजगी रही, जिसका कारण सही जानकारी का अभाव था। उन्होंने स्पष्ट किया कि काशी और निषाद समाज उनके हृदय में हमेशा रहा है और रहेगा।
उन्होंने कहा कि निषाद, बिंद और केवट समाज की ऐतिहासिक पहचान काशी से जुड़ी हुई है, जिसे कोई अलग नहीं कर सकता। उन्होंने समाज के लोगों से अपील की कि वे उन तत्वों और राजनीतिक दलों के खिलाफ एकजुट हों, जिन्होंने उनके अधिकारों को कमजोर करने या उन्हें भ्रमित करने का प्रयास किया है।

डॉ. निषाद ने कहा कि आज भी समाज का एक बड़ा वर्ग गरीबी और अभाव से जूझ रहा है, इसलिए समय की मांग है कि सभी संगठित होकर अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करें। उन्होंने जोर देकर कहा कि निषाद समाज अब जागरूक हो चुका है और अपने हक के लिए हर स्तर पर आवाज उठाने को तैयार है।
उन्होंने केंद्र सरकार और प्रधानमंत्री के नेतृत्व में काशी में हुए विकास कार्यों की सराहना करते हुए कहा कि इससे शहर की पहचान वैश्विक स्तर पर मजबूत हुई है। इसके साथ ही निषाद समाज के नाविकों को भी सम्मान और रोजगार के नए अवसर प्राप्त हो रहे हैं। उन्होंने बताया कि मत्स्य पालन और समाज के कल्याण हेतु केंद्र एवं राज्य सरकार द्वारा चलाई जा रही विभिन्न योजनाएं समाज को आर्थिक रूप से सशक्त बना रही हैं।
डॉ. निषाद ने कहा कि पूर्ववर्ती सरकारों ने निषाद समाज की उपेक्षा की, लेकिन अब योजनाएं जमीनी स्तर पर लागू हो रही हैं और समाज मुख्यधारा से जुड़ रहा है। उन्होंने सभी से एकजुट, सजग और सक्रिय रहने की अपील करते हुए अपने अधिकारों के लिए निरंतर संघर्ष करने का आह्वान किया।
अंत में उन्होंने निषाद राज महाराज गुह्यराज के जयघोष और “हर-हर महादेव” के उद्घोष के साथ अपने संबोधन का समापन किया।
