सुप्रभातम से शयन आरती तक शिवमय काशी की स्मृतियाँ।
काशी जहाँ दिन की शुरुआत सुरों से और रात सुकून से होती थी
काशी के उस कालखंड की कल्पना ही मन में एक अलौकिक शांति भर देती है। वह एक ऐसा समय था ,जब घड़ी की सुइयां नहीं, बल्कि स्वर और शब्द शहर की गति तय करते थे।
भोर का वह दिव्य स्वर जब एमएस शुबूलक्ष्मी और सुप्रभातम
जब सूर्य की पहली किरण गंगा की लहरों को छूने की तैयारी कर रही होती थी, तब समूची काशी एम.एस. सुबूलक्ष्मी के कंठ से फूटते ‘वेंकटेश सुप्रभातम’ के साथ अंगड़ाई लेती थी।
वह मात्र एक भजन नहीं था, बल्कि एक ‘अलार्म’ था जो आत्मा को जगाता था। काशी के चौक स्थित चित्रा सिनेमा हाल के ठीक बगल में लगे कई बड़े लाउडस्पीकरों जो अलग अलग दिशाओं के ओर मुंह करके चतुर्दिक आवाज़ गुंजित करते जैसे हवा में मिश्री घोल तैर रहा हो।
सुबूलक्ष्मी जी की उस गंभीर और भक्तिमयी आवाज़ में एक ऐसा अनुशासन था, जो बनारस की सुबह को एक लयबद्धता प्रदान करता था। लोग नींद से जागते ही उस ईश्वरीय आह्वान से जुड़ जाते थे।
संध्या का समापन शयन आरती का घंटा
दिन भर की गहमागहमी, अस्सी से वरुणा तक की दौड़-भाग और घाटों का शोर सब कुछ धीरे-धीरे शांत होने लगता था। जैसे-जैसे रात गहराती, बाबा विश्वनाथ के दरबार से ‘शयन आरती’ के घंटों की गूँज उठती थी।
वह घंटों की गूँज और शंखनाद इस बात का संकेत था कि अब महादेव विश्राम की ओर हैं और उनके साथ ही पूरी नगरी को अब सुस्ता लेना चाहिए।
जब वह अंतिम घंटा बजता था, तो ऐसा लगता था जैसे किसी बड़े बुजुर्ग ने थपकी देकर सुला दिया हो। वह गूँज कानों में मिश्री की तरह घुलती थी और मन को इस भरोसे के साथ शांत कर देती थी कि ‘बाबा जाग रहे हैं, तुम सो जाओ।’
आज की काशी बदल गई है। शोर बढ़ गया है, डिजिटल अलार्म ने सुप्रभातम की जगह ले ली है और एसी की आवाज़ में शायद मंदिरों की घंटियाँ उतनी साफ़ सुनाई नहीं देतीं। लेकिन मेरे बचपन का वह अनुभव बताता है कि”काशी केवल भूगोल नहीं, एक अहसास है। वह अहसास जो सुबह के सुप्रभातम से लेकर रात की अंतिम आरती तक हमें एक अदृश्य डोर में बाँधे रखता था।”
वह दौर एक साझा संस्कृति का था, जहाँ पूरा शहर एक ही धुन पर जागता था और एक ही प्रार्थना के साथ सोता था। वह वास्तव में ‘शिवमय’ होने का सबसे सरल और सुंदर उदाहरण था।
