धारा लक्ष्य समाचार पत्र
वाराणसी बनारस बार एसोसिएशन के वार्षिक चुनाव में वरिष्ठ उपाध्यक्ष पद के प्रत्याशी एवं वरिष्ठ अधिवक्ता शशांक शेखर त्रिपाठी ने न्यायालय परिसरों में राष्ट्रगान के सामूहिक पाठ को अनिवार्य किए जाने की मांग को लेकर एक महत्वपूर्ण और वैचारिक पहल की है। उन्होंने इस संबंध में माननीय उच्च न्यायालय इलाहाबाद, माननीय जिला न्यायाधीश वाराणसी तथा बनारस बार एसोसिएशन को विधिवत पत्र प्रेषित कर वाराणसी सिविल कोर्ट सहित प्रदेश के समस्त न्यायालय परिसरों में राष्ट्रगान के नियमित सामूहिक पाठ की व्यवस्था लागू करने का आग्रह किया है।
अपने पत्र में शशांक शेखर त्रिपाठी ने उल्लेख किया है कि न्यायालय केवल वाद–विवाद और मुकदमों के निस्तारण का स्थल नहीं हैं, बल्कि वे संविधान, लोकतंत्र, राष्ट्रीय चेतना और विधि शासन के सशक्त केंद्र भी हैं। ऐसे में प्रत्येक कार्यदिवस न्यायालय की कार्यवाही प्रारंभ होने से पूर्व राष्ट्रगान का सामूहिक पाठ न केवल राष्ट्रीय अनुशासन को बढ़ाएगा,
बल्कि अधिवक्ताओं, न्यायिक अधिकारियों, कर्मचारियों और आम नागरिकों में राष्ट्र के प्रति सम्मान, एकता और संवैधानिक मूल्यों की भावना को और अधिक सुदृढ़ करेगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि उनकी वर्तमान और प्राथमिक मांग वाराणसी कचहरी में इस व्यवस्था को लागू कराने की है।
इसके सफल क्रियान्वयन के पश्चात इसे पूरे उत्तर प्रदेश के सभी न्यायालय परिसरों तथा आगे चलकर देश के अन्य सार्वजनिक स्थलों पर भी लागू किया जाना चाहिए।शशांक शेखर त्रिपाठी ने अपने पत्र में कहा राष्ट्रगान भारत की एकता, अखंडता और संवैधानिक आदर्शों का सर्वोच्च प्रतीक है। न्यायालय परिसरों में इसके नियमित पाठ से अनुशासन, गरिमा और राष्ट्रभावना स्वतः विकसित होगी।उन्होंने माननीय उच्च न्यायालय से इस विषय में आवश्यक दिशा-निर्देश जारी करने का अनुरोध भी किया है,
ताकि यह व्यवस्था विधिक और संस्थागत रूप से लागू हो सके।महत्वपूर्ण रूप से, शशांक शेखर त्रिपाठी ने यह भी घोषणा की है कि यदि वे वरिष्ठ उपाध्यक्ष पद का चुनाव जीतते हैं, तो बनारस कचहरी में राष्ट्रगान को अनिवार्य रूप से प्रारंभ कराने के लिए सभी संवैधानिक, प्रशासनिक और सामाजिक प्रयास किए जाएंगे। साथ ही, यदि न्यायालय एवं प्रशासन की अनुमति प्राप्त होती है, तो समाज और अधिवक्ता समुदाय के सहयोग से राष्ट्रगान के सामूहिक पाठ की व्यवस्था सुनिश्चित कराई जाएगी।
कानूनी एवं अधिवक्ता जगत में उनकी इस पहल को राष्ट्रहित से जुड़ा एक गंभीर, वैचारिक और अनुकरणीय कदम माना जा रहा है, जो न्यायालयों की गरिमा और राष्ट्रीय चेतना को नई दिशा देने वाला सिद्ध हो सकता है।

