धूलिवंदन और होली का शास्त्रीय महत्त्व।
सनातन संस्था का दृष्टिकोण |
होली केवल रंगों का उत्सव नहीं, बल्कि गहन आध्यात्मिक आधार वाला पर्व है। होलिका दहन के समय अग्नितत्त्व सक्रिय रहता है और अगले दिन फाल्गुन कृष्ण प्रतिपदा को प्रातःकाल होली की पवित्र राख का पूजन किया जाता है, जिसे धूलिवंदन कहा जाता है। शास्त्रानुसार राख को आज्ञाचक्र पर लगाने से सूक्ष्म शुद्धि और ईश्वरीय संरक्षण प्राप्त होता है। होली की शंकु (कोन) आकार की रचना, विशिष्ट लकड़ी, गोबर के उपले और नैवेद्य अर्पण का भी शास्त्रीय महत्त्व बताया गया है। इसे यज्ञस्वरूप मानकर वातावरण की सात्त्विकता और देवतत्त्व की सक्रियता का माध्यम कहा गया है।
होली में होने वाले प्रमुख अनाचार
हरे पेड़ काटना, कचरा जलाना
शराब, जुआ व अश्लील आचरण
महिलाओं से दुर्व्यवहार
रासायनिक रंगों व गंदे पानी का उपयोग,जबरन चंदा वसूली
संस्था की अपील,सनातन संस्था ने नागरिकों से पर्यावरण-अनुकूल एवं धर्मसम्मत होली मनाने का आह्वान किया है। सुझाव: लकड़ी के स्थान पर गोबर के उपलों का उपयोग
प्राकृतिक रंगों का प्रयोग,पानी की बचत,धूलिवंदन की पवित्र परंपरा का पालन,संस्था का संदेश है कि होली आत्मशुद्धि, पर्यावरण की पवित्रता और आध्यात्मिक उन्नति का पर्व है, जिसे मर्यादित और सात्त्विक रूप से मनाया जाना चाहिए।

