Lucknow UP: शहीद अजमेर अली की पत्नी को चालीस साल बाद भी नहीं मिली पेंशन

अट्ठारह हजार फीट की ऊँचाई पर शहादत, फिर भी पत्नी को नहीं मिला पूरा सम्मान:विजय कुमार पाण्डेय*

धारा लक्ष्य समाचार

लखनऊ। अधिवक्ता विजय कुमार पाण्डेय ने जानकारी देते हुए बताया कि, देश की रक्षा करते हुए सीमा पर अपने प्राणों की आहुति देने वाले शहीद वीर सैनिक अजमेर अली की पत्नी अबरीशा खातून को लिबरलाइज्ड पेंशन नहीं मिलने से वह आफिसों के चक्कर लगाने के लिए मजबूर है l

22 मार्च 1987 को शहीद सैनिक विश्व के सर्वाधिक ऊँचाई वाले दर्रों में से एक लद्दाख क्षेत्र के खारदुंगला पास पर लेह–चलुंका रोड पर तैनात था, जो समुद्र तल से लगभग 18,000 फीट की ऊँचाई पर स्थित है, जहाँ तापमान सामान्य से नीचे और ऑक्सीजन इतनी कमी होती है कि साँस लेना मुश्किल होता है l

विजय कुमार पाण्डेय ने बताया कि, ऐसी चुनौती पूर्ण स्थिति में बंगाल इंजीनियर ग्रुप के जांबाज शहीद सैनिक अजमेर अली तैनात थे, अचानक मौसम परिवर्तन से भारी बर्फबारी होने लगी, लेह–चलुंका रोड पूरी तरह बंद हो गया सेना की आवाजाही और रसद आपूर्ति का सामरिक मार्ग बंद हो गया ।

शहीद अजमेर अली ने अलग-थलग पड़ गयी भारतीय सेना के लिए संपर्क मार्ग खोलने की चुनौती का सामना करने के लिए सीना ताने खड़े रहे और बर्फ को हटाने का कार्य शुरू किया उनके सामने सेना के लिए संपर्क मार्ग खाली रखना बहुत आवश्यक था जिससे सेना संचार और आपूर्ति के लिए शेष भारत से न कटने पाये क्योंकि इसका फायदा दुश्मन उठा सकता था l

उन्होंने खराब मौसम और भारी बर्फबारी की परवाह नहीं की इसी बीच अचानक भारी हिमस्खलन आया और वे बर्फ के नीचे दब गए। ड्यूटी के दौरान ही उन्होंने वीरगति प्राप्त की।

शहीद की पत्नी अबरीशा खातून ने कहा कि, देश के लिए कुर्बानी देने वाले शहीद वीरता और कर्तव्यनिष्ठा को को स्वीकार करते हुए भारत के महामहिम राष्ट्रपति आर वेंकेटरमण द्वारा सन 1989 में मरणोपरांत “कीर्ति चक्र” से सम्मानित किया गया था, जो देश का दूसरा सर्वोच्च शांतिकालीन वीरता पुरस्कार है।

इसके बावजूद आज तक उनकी शहादत को “बैटल कैजुअल्टी (फेटल)” घोषित नहीं किया गया, उदारीकृत पारिवारिक पेंशन प्रदान नहीं की गई । इधर-उधर दफ्तरों के चक्कर लगाने के लिए मजबूर किया जा रहा है l अबरीशा खातून ने कहा यह मामला केवल एक परिवार का नहीं, बल्कि उन सभी सैनिक परिवारों के सम्मान से जुड़ा है जिन्होंने राष्ट्र के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर किया है । यदि न्याय न मिला तो वह न्याय के लिए न्यायालय को दरवाजा खटखटाएंगी l

अधिवक्ता विजय कुमार पाण्डेय ने कहा कि, सरकार और संबंधित अधिकारियों से मांग की जाती है कि शहीद की शहादत के साथ न्याय किया जाए, मृत्यु को बैटल कैजुअल्टी (फेटल) घोषित किया जाए तथा उनकी पत्नी को तत्काल प्रभाव से उदारीकृत पारिवारिक पेंशन और समस्त बकाया देयकों का भुगतान किया जाए । राष्ट्र अपने वीरों के बलिदान को कभी नहीं भूल सकता।

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