धारा लक्ष्य समाचार पत्र
संग्रामपुर/अमेठी।
जिले के विकास खंड संग्रामपुर क्षेत्र में स्वच्छ भारत मिशन के तहत लाखों रुपये की लागत से बनाए गए सामुदायिक शौचालय आज बदहाली के शिकार हैं। जिन शौचालयों से ग्रामीणों को स्वच्छता का लाभ मिलना था, वही आज पानी के अभाव में बेकार साबित हो रहे हैं। स्थिति यह है कि दर्जनों ग्राम पंचायतों में बने सामुदायिक शौचालयों में न तो पानी की व्यवस्था है और न ही न्यूनतम सुविधाएं।
सरकार द्वारा सामुदायिक शौचालयों के रखरखाव व मरम्मत के लिए अलग से धन स्वीकृत किया गया है, लेकिन हकीकत यह है कि कई शौचालयों में साबुन का एक टुकड़ा तक नसीब नहीं है। हाथ धोने और स्नान की व्यवस्था केवल कागजों तक सीमित है। रात में उपयोग के लिए बिजली की व्यवस्था होनी चाहिए, मगर अधिकांश शौचालयों में बल्ब तक नहीं लगे हैं।
सबसे बड़ी विडंबना तब सामने आती है, जब गांव में कोई बाहरी आगंतुक या कार्यक्रम के दौरान लोग इन शौचालयों का उपयोग करने पहुंचते हैं। पानी न होने के कारण उन्हें भारी परेशानी का सामना करना पड़ता है।
क्षेत्र के बदलापुर गांव में बना सामुदायिक शौचालय इसका बड़ा उदाहरण है। पूर्व प्रधान कृष्ण मोहन तिवारी द्वारा परिषदीय विद्यालय के पास यह शौचालय इस उद्देश्य से बनवाया गया था कि विद्यालय में होने वाले सरकारी कार्यक्रमों, बारातों व मांगलिक आयोजनों में ग्रामीणों और आगंतुकों को सुविधा मिल सके। लेकिन आज हालत यह है कि न तो शौचालय खुलता है और न ही पानी की व्यवस्था है। लगातार बंद रहने से दरवाजों में जंग तक लग गया है।
इसी तरह सरैयाकनू का सामुदायिक शौचालय खुला तो रहता है, लेकिन पानी न होने के कारण उसका उपयोग नहीं हो पा रहा है।
यही हाल सोनारीकनू, सरैयाकनू, बड़गांव, मधुपुर खदरी, चण्डेरिया, भावलपुर, गूजीपुर, सहजीपुर, संग्रामपुर, नेवादाकनू, मिश्रौली बड़गांव, पुन्नपुर समेत कई ग्राम पंचायतों का है, जहां सामुदायिक शौचालय केवल नाम मात्र के रह गए हैं।
ग्रामीणों का आरोप है कि रखरखाव के नाम पर पंचायतों में धन तो निकाला जा रहा है, लेकिन उसका वास्तविक लाभ जमीन पर दिखाई नहीं दे रहा। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर स्वच्छता अभियान की सफलता के दावे किस आधार पर किए जा रहे हैं?
अब देखना यह है कि जिम्मेदार विभाग और प्रशासन इन सामुदायिक शौचालयों की बदहाल स्थिति पर कब ध्यान देता है और कब ग्रामीणों को वास्तव में स्वच्छता का लाभ मिल पाता है।

