धारा लक्ष्य समाचार पत्र
बाराबंकी जिले के नवाबगंज तहसील क्षेत्र के ग्राम बंकी देहात की रहने वाली एक बुजुर्ग महिला,जिनकी ज़िंदगी आज अपने ही खेत की मेड़ पर खड़ी होकर इंसाफ़ की राह देख रही है। जरीना के लिए यह ज़मीन सिर्फ मिट्टी नहीं, बल्कि 48 साल की मेहनत, परिवार की पहचान और बुढ़ापे का आख़िरी सहारा है।
जरीना खातून का कहना है कि उनकी पुश्तैनी ज़मीन को लेकर एक सुनियोजित साज़िश रची गई, जिससे उनके हक़ को काग़ज़ों में उलझा दिया गया। यह पूरा मामला गाटा संख्या 554 से जुड़ा है। वर्ष 1977 में जरीना के ससुर रहमतुल्ला ने इस ज़मीन को विधिवत बैनामा कर खरीदा था।
उसी दिन से परिवार इस ज़मीन पर काबिज़ रहा, खेती करता रहा और उसी मिट्टी ने पीढ़ियों को पाला। दशकों तक सब कुछ सामान्य रहा, न कोई विवाद, न कोई दावा।आरोप है कि वर्ष 2025 में प्रॉपर्टी डीलर उस्मान सिद्दीकी उर्फ़ मुन्ना ने ज़मीन खरीदने का प्रस्ताव रखा। 30 लाख रुपये में सौदा तय हुआ और भरोसा दिलाया गया कि पहले जरीना खातून के नाम वरासत दर्ज कराई जाएगी, उसके बाद विधिवत बैनामा होगा।
इसी भरोसे में ₹5 लाख रुपये RTGS के ज़रिये बयाने के तौर पर दिए गए। जरीना खातून को लगा कि अब ज़िंदगी के आख़िरी मोड़ पर सब कुछ साफ़-सुथरा तरीके से निपट जाएगा।लेकिन जरीना का आरोप है कि इसी भरोसे की आड़ में काग़ज़ी खेल शुरू हुआ। उनके नाम वरासत दर्ज कराने के बजाय, पुराने मालिकों के वारिसों के नाम वरासत दर्ज करा दी गई।
यही नहीं, उसी वरासत के आधार पर एक ही गाटा संख्या 554 का दूसरा बैनामा करा दिया गया। आरोप है कि यह बैनामा उस्मान सिद्दीकी के करीबी रवि प्रताप सिंह और अनिल कुमार के नाम कराया गया। ज़मीन आज भी जरीना के परिवार के कब्ज़े में है, खेती आज भी वही लोग कर रहे हैं,
लेकिन काग़ज़ों में तस्वीर बदल दी गई।जरीना खातून बताती हैं कि अनिल कुमार उनके करीबी सहयोगी रहे हैं। इसी नज़दीकी और भरोसे ने कथित तौर पर इस पूरे घटनाक्रम को आसान बना दिया। जब जरीना को यह पता चला कि उनके नाम की जगह किसी और के नाम वरासत दर्ज हो चुकी है, तो उनके पैरों तले ज़मीन खिसक गई। जिस खेत को उन्होंने अपने बच्चों की तरह सींचा, उसी खेत को अब काग़ज़ों में किसी और का दिखाया जा रहा है।
जिलाधिकारी को दिए गए प्रार्थना पत्र के दौरान जरीना खातून अपने आंसू नहीं रोक सकीं। कांपती आवाज़ में उन्होंने कहा कि उनकी किसी से कोई दुश्मनी नहीं है और न ही वह किसी पर ज़बरदस्ती का आरोप लगाना चाहती हैं। उनकी बस एक ही मांग है—साज़िश के ज़रिये कराई गई वरासत की निष्पक्ष जांच हो और उनकी ज़मीन काग़ज़ों में भी उनके नाम से दर्ज की जाए।
आज यह मामला सिर्फ ज़मीन का नहीं, बल्कि उस भरोसे के टूटने की कहानी है जिसने एक बुजुर्ग महिला को न्याय के दरवाज़े तक ला खड़ा किया। एक तरफ 1977 का बैनामा और 48 साल का कब्ज़ा है, दूसरी तरफ काग़ज़ों में की गई चाल। अब सबकी निगाहें जांच पर टिकी हैं—देखना यह है कि इस पूरे मामले की सच्चाई कब सामने आएगी और जरीना खातून को उनका हक़ और सुकून कब वापस मिलेगा, इसका जवाब आने वाला समय ही बताएगा।
लेकिन द पब्लिक मंच के कुछ सवाल हैं।जब 1977 का वैध बैनामा और 48 साल का कब्ज़ा मौजूद है, तो एक ही गाटा संख्या की वरासत और बैनामा काग़ज़ों में कैसे बदल दिया गया?जिस महिला के नाम ज़मीन रही और जो आज भी काबिज़ है, उसके बजाय पुराने मालिकों के वारिसों के नाम वरासत दर्ज कराने की ज़रूरत क्यों पड़ी?भरोसे के नाम पर RTGS से दिए गए लाखों रुपये क्या साज़िश की सीढ़ी बने, और क्या इसी लेन-देन ने पूरे खेल को दिशा दी?
जब ज़मीन मौके पर आज भी उसी परिवार के पास है, तो क्या काग़ज़ों की यह चाल बिना मिलीभगत और भूमिका तय किए संभव थी?

