भारतीय भाषाओं की जड़ों और विविधता पर हुआ मंथन
वाराणसी के ताज होटल में आयोजित तीन दिवसीय बनारस लिटरेचर फेस्ट के चौथे संस्करण में भारतीय भाषाओं की उत्पत्ति, विकास और सांस्कृतिक महत्त्व पर गहन विमर्श किया गया। इस अवसर पर विद्वानों और साहित्यप्रेमियों ने भारतीय भाषाओं की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, सामाजिक परिवर्तनों और सांस्कृतिक संपर्कों की भूमिका पर विस्तार से विचार साझा किए।
कार्यक्रम के स्पॉन्सर एवं कोरल ग्रुप के मैनेजिंग डायरेक्टर खालिद अंसारी ने मीडिया से संवाद करते हुए कहा कि यह मंच भारत की भाषायी परंपरा को समझने और उसकी समृद्ध विरासत को सामने लाने का एक महत्वपूर्ण प्रयास है। उन्होंने बताया कि पंजाबी, भोजपुरी सहित अनेक भारतीय भाषाओं की जड़ें वैदिक और संस्कृत परंपरा में निहित हैं, जो भारत की प्राचीन सांस्कृतिक चेतना को दर्शाती हैं।
खालिद अंसारी ने कहा कि काशी की संस्कृत परंपरा भाषा और संस्कृति के गहरे आपसी संबंधों को स्पष्ट रूप से प्रदर्शित करती है। भारत को भले ही भाषायी और सांस्कृतिक रूप से विभिन्न क्षेत्रों में बाँटा जा सकता है, लेकिन इसकी मूल आत्मा “एकता में विविधता” की भावना से जुड़ी हुई है।
उन्होंने आगे कहा कि बनारस लिटरेचर फेस्ट का यह चौथा वर्ष है और हर वर्ष की तरह इस बार भी बड़ी संख्या में लोग उत्साहपूर्वक कार्यक्रम में भाग ले रहे हैं। यह महोत्सव न केवल भारत की संस्कृति और सभ्यता को प्रदर्शित करता है, बल्कि काशी की विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान को भी राष्ट्रीय मंच पर प्रस्तुत करता है।

