भारतीय ज्ञान परंपरा में राज्य की संकल्पना पर विशिष्ट व्याख्यान आयोजित

वैदिक संहिता में प्राचीन राजनीतिक चिंतन की समृद्ध परंपरा विद्यमान : डॉ. रत्नेश कुमार मिश्र

अवध विश्वविद्यालय में आयोजित व्याख्यान में भारतीय राजशास्त्र एवं राज्य के विकास के विभिन्न सोपानों पर हुई विस्तृत चर्चा

धारा लक्ष्य समाचार पत्र

लखनऊ। डॉ. राममनोहर लोहिया अवध विश्वविद्यालय के सरदार वल्लभभाई पटेल सेंटर फॉर नेशनल इंटीग्रेशन में राजनीति शास्त्र एवं लोक प्रशासन विभाग की ओर से 24 अक्टूबर 2026 को ‘भारतीय ज्ञान परंपरा में राज्य की संकल्पना’ विषय पर विशिष्ट व्याख्यान का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में मुख्य वक्ता के रूप में जवाहरलाल नेहरू पीजी कॉलेज, एटा के डॉ. रत्नेश कुमार मिश्र ने भारतीय राजनीतिक चिंतन की प्राचीनता, वैदिक संहिता में राज्य की अवधारणा तथा राज्य के उद्भव एवं विकास के विभिन्न चरणों पर विस्तार से प्रकाश डाला।

डॉ. मिश्र ने कहा कि अनेक पाश्चात्य राजनीतिक विचारक लंबे समय तक यह मानते रहे कि राजनीतिक चिंतन का सूत्रपात यूनान से हुआ। किंतु भारतीय ज्ञान परंपरा पर हुए व्यापक अनुसंधानों से स्पष्ट हुआ कि प्राचीन भारत में यूनानी राजनीतिक चिंतन के समानांतर, बल्कि उससे भी पहले, राजनीतिक विचारों की एक सुव्यवस्थित एवं समृद्ध परंपरा विद्यमान थी। उन्होंने कहा कि चौथी शताब्दी ईसा पूर्व में जब यूनान में राजनीतिक चिंतन विकसित हो रहा था,

उसी कालखंड में भारत में कौटिल्य ने ‘अर्थशास्त्र’ जैसे महत्त्वपूर्ण ग्रंथ की रचना की। उल्लेखनीय है कि कौटिल्य ने भी अपने से पूर्ववर्ती आचार्यों और उनकी स्थापित परंपरा का उल्लेख किया है, जो भारतीय राजशास्त्र की प्राचीनता को रेखांकित करता है।

भारतीय राजशास्त्र की परंपरा में व्यास, बृहस्पति, भारद्वाज, विशालाक्ष, वाल्मीकि, शुक्राचार्य, पराशर, कामंदक, विदुर, भर्तृहरि, मनु और कौटिल्य सहित अनेक आचार्यों एवं विद्वानों का उल्लेख मिलता है।

वैदिक संहिताओं में राज्य की अवधारणा पर चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि वेद भारतीय ही नहीं, बल्कि विश्व की प्राचीनतम ज्ञान-संपदाओं में सम्मिलित हैं। लंबे समय तक मनु और कौटिल्य जैसे आचार्यों द्वारा प्रतिपादित राज्य की अवधारणाओं को भारतीय राजनीतिक चिंतन की प्राचीनतम अभिव्यक्ति के रूप में अध्ययन किया जाता रहा।

किंतु वैदिक संहिता में निहित राजनीतिक विचारों के अध्ययन से अनेक नवीन तथ्य सामने आए हैं। उन्होंने उदाहरण देते हुए बताया कि जिस प्रकार भारतीय राजनीतिक चिंतन में राज्य की सप्तांग अवधारणा का उल्लेख मिलता है, उसी प्रकार यजुर्वेद में राज्य की कल्पना विराट् पुरुष के रूप में भी की गई है।

राज्य के प्रमुख तत्त्वों की व्याख्या करते हुए डॉ. मिश्र ने कहा कि आधुनिक राजनीतिक सिद्धांत में संप्रभुता, सरकार, जनसंख्या और निश्चित भूभाग को राज्य के चार प्रमुख तत्त्व माना जाता है। वहीं, अथर्ववेद और यजुर्वेद की वैदिक परंपरा में ब्रह्म, क्षत्र, विश् और राष्ट्र जैसे तत्त्वों का उल्लेख मिलता है, जिनके माध्यम से तत्कालीन सामाजिक एवं राजनीतिक व्यवस्था को समझा जा सकता है।

राज्य के उद्भव एवं विकास के सिद्धांतों पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि आधुनिक राजनीतिक चिंतन में दैवीय सिद्धांत, परिवार सिद्धांत, शक्ति सिद्धांत, सामाजिक समझौता सिद्धांत और विकासवादी सिद्धांत सहित अनेक अवधारणाएं प्रचलित हैं। इनमें विकासवादी सिद्धांत को व्यापक स्वीकार्यता प्राप्त है। इस संदर्भ में उन्होंने अथर्ववेद के अष्टम कांड के दशम सूक्त के प्रथम तेरह मंत्रों का उल्लेख करते हुए कहा कि इनमें राज्य के विकास के सात सोपानों की व्याख्या की गई है।

आचार्य प्रियव्रत वेदवाचस्पति के अध्ययन का संदर्भ देते हुए डॉ. मिश्र ने राज्य के विकास की विभिन्न अवस्थाओं का वर्णन किया। उनके अनुसार, प्रारंभिक अवस्था विराट् अथवा विराज् की रही होगी, जिसे राज्यविहीन अवस्था के रूप में समझा जा सकता है। इसके बाद गृहपति अथवा कुटुंब के मुखिया की अवस्था विकसित हुई। तीसरे चरण में कुटुंबों के समूह अथवा पंचायत से संबंधित आहवनीय अवस्था का उल्लेख मिलता है।

इसके पश्चात आहवनीयों के समूहन की स्थिति में दक्षिणाग्नि अवस्था आई। सामाजिक जीवन में वाणिज्य, व्यापार और अन्य गतिविधियों के विस्तार के साथ व्यवस्था जटिल होती गई, जिससे विभिन्न वर्गों एवं घटकों के विचारों को समझने और समन्वित करने के लिए सभा जैसी संस्था की आवश्यकता उत्पन्न हुई।

सभा में लोग एकत्र होकर विचार-विमर्श करते रहे होंगे, जिसकी कार्यप्रणाली में आधुनिक संसद की व्यवस्था से कुछ समानताएं दिखाई देती हैं।

उन्होंने आगे बताया कि विकास के अगले चरण में सभा से अधिक व्यापक अथवा विशिष्ट भूमिका वाली संस्था के रूप में समिति का उल्लेख मिलता है। अंततः विभिन्न राष्ट्रों के बीच उत्पन्न संघर्षों के समाधान के लिए आमंत्रण अवस्था की परिकल्पना सामने आती है, जो व्यापक अंतरराष्ट्रीय विमर्श अथवा राजसभाओं की अवधारणा से साम्य रखती है। उन्होंने कहा कि इस परिकल्पना में आधुनिक संयुक्त राष्ट्र संघ की व्यवस्था से भी कुछ समानताएं देखी जा सकती हैं।

डॉ. मिश्र ने कहा कि भारतीय वैदिक संहिता में राज्य की अवधारणा से संबंधित ज्ञान अत्यंत व्यापक और महत्त्वपूर्ण है। इस परंपरा का गंभीर एवं गहन अध्ययन वर्तमान राजनीतिक चिंतन को नई दृष्टि प्रदान कर सकता है। उन्होंने भारतीय ज्ञान परंपरा में निहित राजनीतिक सिद्धांतों के अध्ययन, अनुसंधान और अकादमिक विमर्श को और अधिक प्रोत्साहित किए जाने की आवश्यकता पर बल दिया।

कार्यक्रम के अंत में सरदार वल्लभभाई पटेल सेंटर फॉर नेशनल इंटीग्रेशन के समन्वयक प्रोफेसर सुरेंद्र मिश्र ने सभी अतिथियों, वक्ता एवं उपस्थितजनों के प्रति आभार व्यक्त किया। इस अवसर पर राजनीति शास्त्र एवं लोक प्रशासन विभाग के प्राध्यापकगण तथा बड़ी संख्या में छात्र-छात्राएं उपस्थित रहे।

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