मानवीय संवेदना और सामाजिक कट्टरता पर कड़ा प्रहार करती हैं। प्रेमचंद की कहानी। सुरेश चंद्र दुबे
प्रेमचंद की ‘चोरी’ केवल अपराध और उसकी खोज की कहानी नहीं है, बल्कि यह मानवीय संवेदनाओं, विश्वास और आत्मसम्मान का दस्तावेज है। यह कहानी हमें सिखाती है कि बिना सोचे-समझे किया गया संदेह किसी निर्दोष के दिल पर कितना गहरा घाव दे सकता है। आज के संदर्भ में भी यह कहानी उतनी ही प्रासंगिक है, क्योंकि समाज का कमजोर तबका आज भी इसी तरह के पूर्वाग्रहों का शिकार होता है। यह कहानी पाठक को झकझोरती है और एक बेहतर इंसान बनने की प्रेरणा देती है। उक्त कथन प्रो श्रद्धानंद जी द्वारा प्रेमचंद की जन्मभूमि लमही गूंजी प्रेमचंद की कहानी चोरी का पाठन नंदलाल राजभर ने
वाराणसी के लमही स्थित प्रेमचंद मार्गदर्शन केंद्र ट्रस्ट द्वारा आयोजित साप्ताहिक साहित्यिक कार्यक्रम “सुनो मैं प्रेमचंद” के 1931वा दिवस संपन्न हुआ। कार्यक्रम में स्थानीय साहित्यप्रेमियों, विद्यार्थियों और शोधार्थियों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया। इस अवसर पर रामनरेश पाल ने एकल काव्यपाठ किया,
कार्यक्रम की शुरुआत उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद की प्रतिमा पर माल्यार्पण कर किया गया। श्रीप्रकाश चंद्र श्रीवास्तव ने कहा कि प्रेमचंद ने दिखाया है कि कैसे एक छोटा सा संदेह सीधे तौर पर किसी व्यक्ति के चरित्र और आत्मसम्मान को चोट पहुँचाता है। कहानी में यह भी उजागर किया गया है कि अमीर वर्ग अक्सर गरीब या नौकर पेशा लोगों को बिना किसी ठोस सबूत के चोर मान लेता है। निदेशक राजीव गोंड ने बताया कि “सुनो मैं प्रेमचंद” श्रृंखला आगामी सत्रों में भी उनकी अन्य कहानियों पर इसी तरह संवाद जारी रहेगा। इस अवसर पर टीका राम, अखलाक अहमद, लियाकत अली, अतुल यादव, प्रांजल श्रीवास्तव, संगीत श्रीवास्तव, समीक्षा त्रिपाठी, आलोक शिवाजी, डाक्टर मनोहर लाल, मनोज श्रीवास्तव, कुमार महेंद्र, राहुल यादव, समीक्षा त्रिपाठी, रोहित गुप्ता, विपनेश सिंह, संजय श्रीवास्तव, राधेश्याम पासवान, एवं छात्र, साहित्यप्रेमी, और स्थानीय नागरिक उपस्थित रहे। कार्यक्रम का संचालन आयुषी दूबे ने किया, सभी का स्वागत मनोज विश्वकर्मा व धन्यवाद ज्ञापन रोहित गुप्ता ने किया।
