संतरे के छिलके से बनी तकनीक से जहरीले रंगीन रसायन को हटाने में सफलता।
आईआईटी बीएचयू और पारुल विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने विकसित की पर्यावरण अनुकूल तकनीक।
वाराणसी, 25 मई। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (काशी हिन्दू विश्वविद्यालय) और पारुल विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने औद्योगिक अपशिष्ट जल से अत्यंत जहरीले और कैंसरकारी मैलाकाइट ग्रीन रंगीन रसायन को हटाने के लिए एक नई और पर्यावरण अनुकूल तकनीक विकसित की है। इसे औद्योगिक जल प्रदूषण की गंभीर समस्या के समाधान की दिशा में बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है।
यह संयुक्त शोध कार्य आईआईटी बीएचयू के जैव रासायनिक अभियांत्रिकी विद्यालय तथा पारुल प्रौद्योगिकी संस्थान, पारुल विश्वविद्यालय वडोदरा के रासायनिक अभियांत्रिकी विभाग द्वारा किया गया। शोध दल में आईआईटी बीएचयू के सह आचार्य डॉ. विशाल मिश्रा के साथ आलोक तिवारी, गौरांग डामले, डॉ. शिवेंदु सक्सेना, डॉ. विशाल सांधवार, दीक्षा सक्सेना तथा जेएसपीएम विश्वविद्यालय पुणे के डॉ. दीपक जाधव शामिल रहे।
शोध के निष्कर्ष रॉयल सोसाइटी ऑफ केमिस्ट्री की प्रतिष्ठित शोध पत्रिका आरएससी एडवांसेज़ में “जलीय घोलों से मैलाकाइट ग्रीन का नवीन टिन ऑक्साइड आधारित नैनो मिश्रित पदार्थ द्वारा अधिशोषण” शीर्षक से प्रकाशित हुए हैं।
शोधकर्ताओं द्वारा विकसित यह नवीन नैनो मिश्रित पदार्थ संतरे के छिलके के अर्क का उपयोग प्राकृतिक अवकरणकारी माध्यम के रूप में करके तैयार किया गया है। इससे यह तकनीक पूरी तरह पर्यावरण अनुकूल और अपशिष्ट आधारित बन गई है। इसमें टिन ऑक्साइड नैनोकणों पर पॉलिएनिलीन और पॉलीपाइरोल की सह-पॉलिमर परत इन-सीटू पॉलिमरीकरण तकनीक से विकसित की गई है।
तकनीक की प्रमुख विशेषताएं
संतरे के छिलके जैसे नवीकरणीय और शून्य लागत वाले अपशिष्ट पदार्थ का उपयोग
मात्र 30 मिनट में 97.06 प्रतिशत मैलाकाइट ग्रीन हटाने की क्षमता
1250 मिलीग्राम प्रति ग्राम की अत्यधिक उच्च अधिशोषण क्षमता
महंगे उपकरण, खतरनाक रसायन या विशेष प्रशिक्षित श्रमिकों की आवश्यकता नहीं
गैर विषाक्त, जैव संगत और औद्योगिक उपयोग के लिए आसानी से विस्तार योग्य तकनीक
विश्वभर में औद्योगिक इकाइयों से निकलने वाले रंगीन रसायन युक्त अपशिष्ट जल को गंभीर पर्यावरणीय संकट माना जाता है। मैलाकाइट ग्रीन विशेष रूप से जहरीला, कैंसरकारी और जैविक रूप से अपघटित न होने वाला रसायन है, जो जलीय जीवों और मानव स्वास्थ्य के लिए अत्यंत हानिकारक है।
इस उपलब्धि पर आईआईटी बीएचयू के निदेशक प्रो. अमित पात्रा ने शोधकर्ताओं को बधाई देते हुए कहा कि इस प्रकार का सहयोगात्मक और अनुप्रयुक्त शोध संस्थान की सामाजिक तथा पर्यावरणीय चुनौतियों के समाधान के प्रति प्रतिबद्धता को दर्शाता है। उन्होंने कहा कि आईआईटी बीएचयू समाजोपयोगी और वैश्विक स्तर पर प्रभाव डालने वाले नवाचारों को निरंतर प्रोत्साहित करता रहेगा।
