SAHARANPUR NEWS भारतीय ज्ञान परम्परा और समकालीन वैश्विक संकटों पर दो दिवसीय राष्ट्रीय सेमिनार का गरिमापूर्ण समापन

 

नैतिक मूल्यों, मानवीय दृष्टिकोण और आधुनिक तकनीक के संतुलित समन्वय पर हुआ व्यापक अकादमिक मंथन

धारा लक्ष्य समाचार
सहारनपुर।
माँ शाकुम्भरी विश्वविद्यालय में “भारतीय ज्ञान परम्परा और समकालीन वैश्विक संकट: नैतिक मूल्यों के आधार पर समाधान की संभावनाएं” विषय पर आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय सेमिनार का आज गरिमापूर्ण समापन हुआ। 18 एवं 19 सितंबर 2026 को आयोजित इस राष्ट्रीय सेमिनार में भारतीय ज्ञान परम्परा की समकालीन प्रासंगिकता तथा वर्तमान वैश्विक, सामाजिक, नैतिक और तकनीकी चुनौतियों के समाधान की संभावनाओं पर व्यापक अकादमिक विमर्श किया गया।
यह सेमिनार माँ शाकुम्भरी विश्वविद्यालय सहारनपुर के School of Public Administration एवं School of Political Science तथा Department of Political Science, Chaman Lal Mahavidyalaya (Autonomous), Landhaura, Haridwar द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित किया गया तथा इसे Indian Council of Social Science Research (ICSSR), New Delhi का प्रायोजन प्राप्त रहा।
कुलपति प्रो. विमला वाई की अध्यक्षता में समापन समारोह हुआ।
दो दिवसीय सेमिनार के समापन समारोह की अध्यक्षता माँ शाकुम्भरी विश्वविद्यालय की माननीय कुलपति प्रो. विमला वाई ने की। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि प्रो. संजीव कुमार शर्मा, General Secretary and Treasurer, Indian Political Science Association तथा पूर्व Vice-Chancellor, Mahatma Gandhi Central University, Motihari, Bihar रहे।
समापन समारोह में विशिष्ट अतिथि प्रो. ममता सिंह की गरिमामयी उपस्थिति रही। साथ ही प्रो. ममता सिंघल, प्रो. विनोद कुमार तथा विश्वविद्यालय के वित्त अधिकारी श्री सूरज कुमार भी कार्यक्रम में उपस्थित रहे।
मुख्य अतिथि प्रो. संजीव कुमार शर्मा ने अपने संबोधन में भारतीय ज्ञान परम्परा की समकालीन प्रासंगिकता तथा वर्तमान समय में नैतिक एवं मानवीय मूल्यों की आवश्यकता पर विचार व्यक्त किए। उन्होंने ज्ञान और समाज के बीच संबंध को रेखांकित करते हुए समकालीन चुनौतियों के संदर्भ में भारतीय चिंतन की उपयोगिता पर प्रकाश डाला।
माननीय कुलपति प्रो. विमला वाई ने अपने अध्यक्षीय संबोधन में दो दिवसीय राष्ट्रीय सेमिनार के सफल आयोजन के लिए सभी विद्वानों, शोधार्थियों, प्रतिभागियों और आयोजन टीम को बधाई दी। उन्होंने भारतीय ज्ञान परम्परा को समकालीन शिक्षा, शोध और सामाजिक जीवन से जोड़ने की आवश्यकता पर बल दिया।
समापन सत्र में अतिथियों की उपस्थिति ने कार्यक्रम को विशेष गरिमा प्रदान की। इस अवसर पर दो दिनों के दौरान हुए अकादमिक विमर्श, शोध-पत्र प्रस्तुतियों और तकनीकी सत्रों की उपलब्धियों को समेकित रूप से प्रस्तुत किया गया।
तकनीकी सत्र में धर्म और आपराधिक न्याय व्यवस्था के संबंध पर भी चर्चा हुई। भारतीय दार्शनिक परम्परा में धर्म, न्याय, कर्तव्य और नैतिक उत्तरदायित्व से जुड़े विचारों की समकालीन प्रासंगिकता पर विमर्श किया गया।
द्वितीय दिवस के तकनीकी सत्र की अध्यक्षता प्रो. ममता सिंघल ने की तथा डॉ. पी. के. वर्ष्णेय मुख्य वक्ता रहे। सत्र में भारतीय ज्ञान परम्परा, मानवीय मूल्यों, सामाजिक उत्तरदायित्व, आध्यात्मिक चिंतन, मानव सुरक्षा तथा समकालीन वैश्विक चुनौतियों से जुड़े विभिन्न विषयों पर विचार-विमर्श किया गया।
भारतीय ज्ञान परम्परा और आधुनिक तकनीक के बीच संवाद पर जोर दिया।
पूरे सेमिनार के अकादमिक विमर्श में एक महत्वपूर्ण विचार यह रहा कि भारतीय ज्ञान परम्परा को केवल अतीत की विरासत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। इसके नैतिक, मानवीय और संतुलित जीवन-दृष्टि से जुड़े तत्व वर्तमान समय की सामाजिक, तकनीकी और वैश्विक चुनौतियों पर विचार करने में उपयोगी हो सकते हैं।
कार्यक्रम का मंच संचालन डॉ. अपूर्वा द्वारा प्रभावी एवं गरिमापूर्ण ढंग से किया गया। उन्होंने समापन सत्र की विभिन्न गतिविधियों को सुव्यवस्थित रूप से संचालित किया।
समापन अवसर पर दो दिवसीय सेमिनार के तकनीकी सत्रों का समेकित प्रतिवेदन डॉ. मितिका द्वारा प्रस्तुत किया गया। उन्होंने दोनों दिनों में हुए शोध-विमर्श, प्रमुख विषयों और अकादमिक निष्कर्षों को सामने रखा।
रिपोर्ट में यह रेखांकित किया गया कि भारतीय ज्ञान परम्परा का महत्व केवल उसके ऐतिहासिक स्वरूप में नहीं, बल्कि इस बात में भी है कि वह वर्तमान समय में नैतिकता, मानवीय संवेदना, न्याय, संतुलन और जिम्मेदार तकनीकी विकास पर विचार करने का आधार प्रदान करती है।
सांस्कृतिक कार्यक्रम ने आयोजन की गरिमा बढ़ाई।
समापन समारोह में सांस्कृतिक कार्यक्रम भी आयोजित किया गया, जिसमें भारतीय संस्कृति, परम्परा और मूल्यों की सुंदर झलक देखने को मिली। सांस्कृतिक प्रस्तुतियों ने पूरे आयोजन को अकादमिक विमर्श के साथ-साथ भावनात्मक एवं सांस्कृतिक आयाम भी प्रदान किया।
चार वर्षीय अरविका सिंह की श्लोक प्रस्तुति ने सबका मन मोहा।
सेमिनार में भारतीय ज्ञान परम्परा की जीवंत झलक उस समय देखने को मिली, जब चार वर्षीय अरविका सिंह ने मंच पर संस्कृत श्लोकों का सुंदर पाठ प्रस्तुत किया। उनकी सहज एवं आत्मविश्वासपूर्ण प्रस्तुति ने पूरे वातावरण को भावपूर्ण बना दिया और सेमिनार में चार चाँद लगा दिए। उनकी प्रस्तुति ने यह संदेश भी दिया कि भारतीय ज्ञान परम्परा केवल पुस्तकों तक सीमित नहीं, बल्कि संस्कारों और पीढ़ियों के माध्यम से निरंतर आगे बढ़ने वाली जीवंत परम्परा है।डॉ. विजय प्रताप सिंह और डॉ. निशु कुमार की महत्वपूर्ण भूमिका। सेमिनार के Convenor डॉ. विजय प्रताप सिंह ने आयोजन की अकादमिक दिशा, विषयगत समन्वय एवं समग्र आयोजन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। सेमिनार के विषय एवं उद्देश्य की प्रस्तुति भी प्रथम दिवस के उद्घाटन सत्र में डॉ. विजय प्रताप सिंह द्वारा की गई थी।
Organising Secretary डॉ. निशु कुमार ने आयोजन के समन्वय एवं व्यवस्थाओं में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने उद्घाटन सत्र में स्वागत संबोधन भी किया।
दोनों के नेतृत्व एवं समन्वय से सेमिनार के विभिन्न सत्रों को व्यवस्थित रूप से संचालित किया गया।
आयोजन टीम का सक्रिय योगदान रहा।
आयोजन टीम में सुश्री पारुल, सुश्री वर्षा, पूजा, डॉ. अंकिता एवं डॉ. प्रतिभा की सक्रिय उपस्थिति एवं सहभागिता रही। टीम ने तकनीकी सत्रों, प्रतिभागियों के समन्वय तथा आयोजन संबंधी विभिन्न व्यवस्थाओं में महत्वपूर्ण योगदान दिया।दो दिवसीय राष्ट्रीय सेमिनार का समापन भारतीय ज्ञान परम्परा, नैतिक मूल्यों, मानवीय संवेदना और समकालीन चुनौतियों के बीच सार्थक संवाद के संदेश के साथ हुआ।

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